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माटी की देह

तरु के वृंत पर खिलता सुमन
देख  आज जग की खुशहाली  
इतरा रहा भाग्य पे अपने भुवन
क्या पता कल आये न आये हरियाली
क्षणिक हैं दिन बहार के
क्रूर  हाथों से   कल कोई माली
गूँथ कर तुम्हे हार प्रणय के
छीन  ले सौन्दर्य का लाली
रूप लावण्य का मत दंभ भर
देख लालायित मधुप को
मदहोश सा  अंग - अंग चूमता
आतुर तुम्हारे रसपान को
मुट्ठी का रेत सा है जीना
जान  यह मन होता विचलित
हरि - शीश पर जाने कब चढ़ जाना
यही अनिश्चित है निश्चित
पछताएगा रिश्तों से कर नेह
चार दिन का है हँसना - गाना
फिर तो माटी की देह
है माटी में मिल जाना ।

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प्रीत के गलियारे में


मुखर पड़े हैं शब्द हमारे 
प्रीत के गलियारे में।
यायावर मन ठहर गया 
स्वप्न सिंध में तर  गया 
मोह रहा संसार सारा 
विरस पतझड़ भी लगे  प्यारा ।
 मन  में  तरंग प्रवहित 
अंग - अंग उल्लसित 
अहर्निश जपूँ नाम जिसका 
भीगे अधरों के कंपन  में ।
मुखर पड़े हैं शब्द हमारे 
प्रीत के गलियारे में।
पद्मिनी मुस्काई मंद - मंद 
गीत बन गया छंद - छंद
 समंदर  है उफन  रहा 
स्वर्णाभ लिए  दमक रहा ।
लहर - लहर है उन्मादित 
अवनि से अम्बर तक श्रृंगारित 
अश्वन का  प्रलय होता  
कबसे रीते नैनन  में।
 मुखर  पड़े  हैं शब्द हमारे 
प्रीत के गलियारे में।
चाँद इठलाता मुग्ध सा 
लुटा कर चाँदनी दुग्ध सा 
भा  गया कोई ख़ास 
हिय में भर उजास ।
शाख - प्रशाख है पल्लवित 
रोम - रोम हो रहा पुलकित 
इक - दूजे का मौन निमंत्रण स्वीकारें 
आकर मन के बहकावे में ।
 मुखर  पड़े  हैं शब्द हमारे 
प्रीत के गलियारे में।

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चाँद सुलगता रहा

जज़्ब कर लहरों  को
कतरा - कतरा भरभरा जाता  
नित रच नए प्रासादों को 
 रेत खुद रीतता जाता ।
पावस नेह में जी पड़ीं 
दलदल हुई नदियाँ 
इक पिपासा अनंत सी उमड़ी 
और पी गयी अंतर का दरिया ।
कभी -कभी छलकता है समंदर 
शाम की  तन्हाइयों में 
डूबते - उतराते  अनगिन मंज़र  
छा जाते हैं वीरानों में ।
 ठहरे पानी में फेंक पत्थर 
कोई बात पुरानी छेड़ता है 
हलचलें थमतीं मंथर - मंथर 
कोरों पर पानी फैलता है  ।
उजालों का तेवर देख लिया 
चुभती हैं नस - नस में 
वृक्षों ने भी किनारा कर लिया 
चली जब छाँह की तलाश में ।
शहर की चकाचौंध छोड़ 
गली - गली गुजरता रहा 
अपनी शीतल चाँदनी छोड़ 
चाँद भी सुलगता रहा ।
हश्र यही है प्यार में 
भोर का तारा सोचता  
टूटकर किसी की दुआओं में 
जगह अपनी  बना जाता ।

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फिर लौट रहा मधुमास

फिर लौट   रहा   मधुमास 


फिर लौट   रहा   मधुमास 
हरे रंग का ओढ़े लिबास
 ख़ुश्क  रंगत निखर गयी 
दुल्हन सी प्रकृति सज गयी ।

पवन रथ में हो सवार 
परिणय मिलन को बेकरार 
तूफ़ां लिए पयोद मचल रहा 
अरमान इधर भी धधक रहा ।

कलियों में जो मुस्कान भरता 
उर में वो उल्लास रचता 
माटी में सौंधी महक
कानन में कौंधी चहक।

सुर के पाखी लुभाते 
डाली - डाली पींगें लगाते 
नीड़ों में कहाँ चैन - बसेरा
उनींदी आँखों में होता सबेरा ।

छा  गया समंदर गगन में 
विटप मुस्काया  उपवन में 
कोई संदेशा भेजा ना तार 
पाहुन का फिर भी  है इंतज़ार । 

मन पखेरू उड़ चला 
प्रकृति संग झूम चला 
कण - कण को है आभास 
फिर लौट रहा मधुमास ।   

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     बोंसाई

मैं कोई बोंसाई का पौध नहीं 
जिसकी जड़ों को काट कर 
शाखाओं - प्रशाखाओं को छाँट कर 
एक गमले में रोप दिया ।
मैं तो मैं हूँ ।
बेटी ,बहन और पत्नी  के रिश्तों का 
निर्वहन करती हुई भी 
एक स्वतंत्र व्यक्तित्व  हूँ ।
अपना एक वजूद है 
एक ठोस ज़मीनी सतह हूँ 
जिस पर काल के झंझावातों ने 
कम विनाश नहीं रचा।
फिर भी सुनहरी किरणों वाला सूर्य 
हर दिन उगता है ।
हवाएँ सुरमयी संगीत बिखेरती हैं
नव पल्लवन को मैं उल्लसित रहती हूँ ।
मेरे अंतर को चीर कर देखो 
गर्म लावा प्रवहित है   ।
जब भी मेरे वजूद को ललकारा 
मैं ज्वालामुखी बन जाती हूँ ।
नहीं बनती मैं बेवज़ह बर्बादी का सबब 
लेकिन मेरी कोमलता कायरता नहीं है ।
बंधी है इसमें एक कूल की मर्यादा 
और आँगन की किलकारियों का अविरल प्रवाह ।
कुम्हार के चाक सा सुगढ़ निर्माण 
लिखा है मेरी हथेलियों में 
फिर भला क्यूँकर इनसे हो  विनाश ?
अपने सर्ग का उपहार 
बस यही माँगू  मैं 
कि बढ़ने दो मुझे वट सा विस्तृत ।
मेरी छांव से ना कर गुरेज
प्रकृति ,प्राणी ,प्रयास 
मैं ही तो हूँ ।
बोंसाई के बगल में 
अपनी पौध लहरा कर 
सामंजस्य कैसे कर पाओगे तुम ?
दो एक विशाल आयाम मुझे 
और अगर नहीं  दे पाए 
तो मेरे आकाश को ना बाँधो
उड़ने दो मुझे स्वतः
जैसे नील गगन में उड़ता जाता है 
पक्षी क्षितिज के पार ।  

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   वह तुम ही हो 

मन  के आकाश में उमड़ता 
उलझनों का बादल घुमड़ता 
संतृप्त हों बूँदें बरसतीं 
जैसे व्यथा गीत में ढलती 
नभ में फिर तीक्ष्ण किरणें चमकतीं 
नव चेतना नस -नस में प्रवहती
रोशनाई बन जो महाकाव्य रचवाता
और कोई नहीं ,वह तुम ही हो चैतन्य विधाता ।

रात भयावह हो काली
दुर्लभ हो सुबहा की लाली 
आँधियों के दस्तक से विह्वल
टूटकर बिखरती प्रतिपल 
फिर भी नहीं टूटती आस 
समेटती हूँ क्षीण पड़ी साँस
जुगनू बन चमक रहा मेरे शीर्ष 
और कोई नहीं वह ,तुम ही हो मेरे श्रीश ।

अपनों का दिया दर्द बेशक भारी होता 
अंतर का प्रलाप इसलिए बेकाबू होता 
सैलाब तोड़ जो पीड़ा बह निकलती 
वही तो अपनी है ,बाकी सब छलती
हमराही छोड़ देते जीवन के चौराहे में 
किस मोड़  मुड़ूँ अपलक निहारूं फलक में 
अतुल प्रकाश से दमकता वो अटल सितारा 
और कोई नहीं ,वह तुम ही हो, मेरे ध्रुवतारा।

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  कहीं कुछ रिक्त है


पतझड़ की एक सूखी पत्ती थी 
उठा कर तुमने उकेर दिया 
सुन्दर सी चित्रकारी 
भर दिया नेह का रंग 
कोरी कल्पनाएँ कसमसा उठीं 
और मैं वसंत की बहार बन गयी ।
वह भी अपना ही संसार था 
अपने सूनेपन की मलका 
ख़ामोशी के अनकहे गीत पर 
बेपरवाह थिरकना 
मुझ पर बरसा कर प्रेमरस 
क्या जादू कर डाला
अपने देहयष्टि में मैं 
अपनी ही नहीं रही ।
साँसों की गर्मी से टपकता स्वेद 
पिघलता अहसास बूंद - बूंद
स्मृति चिह्न बन कर रह गया 
और शुरू हुआ आँखों के समंदर में 
तूफानों का सिलसिला 
मच गया हृदय में हाहाकार
इंतज़ार के बेहद निर्दयी पल 
घायल करते गए वार पर वार ।
बिछोह की पीड़ा में प्रेम की सन्तति कहाँ 
गगन ,सलिला ,किसलय ,कलोल 
सभी आत्मीय लगते हैं 
फिर भी कहीं कुछ रिक्त है ।
ऐसा लगता है 
मुद्दतों से सावन नहीं आया 
अनुराग के अंकुर फूटे नहीं ।
नज़रें तकती हैं राह अनिमेष 
तुम ही बादल हो संतृप्ति के 
तुम वसंत दूत,
तुम प्रेम की प्रतीति हो 
और नहीं पाने को कुछ शेष ।

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