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चलने को तो चल रही है ज़िंदगी
बेसबब सी टल रही है ज़िंदगी ।

बुझ गये उम्मीद के दीपक सभी
तीरगी में ही पल रही है ज़िंदगी ।

ऐ खुदा ,रहमो इनायत पे तेरी
ये मुकम्मल फल रही है ज़िंदगी ।

हमसफ़र आ थाम ले दामन मेरा
बिन तेरे अब खल रही है ज़िंदगी ।

जो लहक तूने लगायी प्यार की
देख उसमें जल रही है ज़िंदगी ।

जैसे कोई बर्फ़ का सिल्ली हो ये
अब हरिक पल गल रही है ज़िंदगी ।

वैसे तो चार दिन की है मगर
आजकल में टल रही है ज़िंदगी ।

काश ,आए मेरे गुलशन में बहार
चाह में ही ढल रही है ज़िंदगी । 

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक  – (31 August 2017 at 21:08)  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (02-09-2017) को "सिर्फ खरीदार मिले" (चर्चा अंक 2715) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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