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सडकों में नपती हैं शहरों की दूरियां 
दिल के रिश्तों में कहाँ कमती दूरियां 

अहसासों को  बाँध लेते गर सीमाओं में 
फिर कहाँ सालती हमारे  बीच की दूरियां 

टूट जाता है सब्र का सैलाब कभी- कभी 
बारिशों  में जब जिय जलाती हैं दूरियां 

पहले तो पंछी भी पहुंचाते थे सन्देश
अब कहाँ रहे पंछी कि तय करें दूरियां

सीने में आग लेकर भी जी रहे मुकम्मल
इस  आग को और हवा देती हैं दूरियां...copyright kv

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अनचाहा मिल जाता है
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एक याद आती है सहसा 
हृदय सुमन खिल जाता है 
जिसकी चाह ,नहीं मिलता वह 
अनचाहा मिल जाता है। 

हो नज़रों से दूर भले तुम 
मन में पर तुम ही तुम हो 
सिर्फ साथ रहने भर से ही 
उधड़ा मन सिल जाता है। 

हर एक दुआ हो गर कुबूल 
जीवन नहीं पहेली होगा 
उदासियों के मंज़र पर भी 
मन अक्सर हिल जाता है। 

पेंचोखम में उलझ - उलझ  कर 
बहुत बेरहम हुई उम्र यह 
एक तुम्हारे आने भर से 
हृदय कलुष धुल जाता है। 

खुश हूँ जब से ठानी मैंने 
हर हालत में खुश रहना है 
सजदे करती हूँ मंदिर में 
मेरा मन छल जाता है। 

क़ैद आज भी आँखों में है 
तुमसे मिलने के वो सपने 
निकट तुम्हारे आना चाहूँ 
मेरा पाँव फिसल जाता है। 

कोई शिकवा नहीं किसी से 
नहीं इल्तज़ा अरी ज़िन्दगी 
मेरा तो यादों भर से ही 
सारा काम निकल जाता है।  

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संक्रमण
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युग का सबसे संक्रमणकारी दौर है यह 
हवा में तैरते वायरस कितनी जल्दी 
बातों के रोग का संक्रमण फैला देते हैं 
इसका अंदाजा भी नहीं लगता। 
बेबात पर बात बढ़ जाती है 
चुप रहने पर बवाल  हो  जाता  है
 यही  तो संक्रमण है 
खड़ा होता है वह  अकेला कवि 
चारों ओर से घिरा हुआ 
शक्तिशाली ,तलवारधारी ,बाहुबलियों से 
और ,अभिमन्यु तो निहत्था है 
लड़ रहा है अपने शब्दों के बल पर
आँखों  में रोश ,हृदय में आग  लिए
जूझ रहा है मूल्यों की धरातल पर । 
एक तरफ हथियार है 
एक तरफ अकेला कलमकार 
मूक दर्शक बन देखने वाले मानुष 
जिजीविषा की लालसा रखते हो 
तो कूद पड़ो अभिमन्यु के साथ 
 जीतेजी भी तो तुम मरते आये हो 
युगों से ,क्योंकि तुम शब्दहीन हो 
पर वह मसिजीवी जीवित रहेगा 
बिना संक्रमण का शिकार हुए। 

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उसूलों की लड़ाई
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परिवेश का प्रभाव
आधुनिक सोच के तीखे तेवर
सब कुछ हावी हो जाता है
पुरातनपंथी कहलाने वाले
तथाकथित माता - पिता पर
वयस्क होते बच्चों के अपने पैमाने
अपनी जटिल लीक पर चलते हुए
हमारे निर्दिष्ट उसूलों पर
अक्सर आघात करते हैं
तब हमें अपनी ही कार्यशैली
चिढ़ाती हुई सी प्रतीत होती है।
 जिसे हम पीढ़ियों का अंतर कहते हैं
वह बड़ी सहजता  से
हमारे पैदाइशी मौलिकता को
निगल लेते हैं
और हम किंकर्तव्यविमूढ़ सा
अपने ताने - बाने में विचरते
मौन हो जाते है।
हमारा मौन होना हमारी स्वीकृति नहीं
आत्मसमर्पण भी  नहीं ,बस
आत्ममंथन है
लेने - देने की प्रक्रिया पर।

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अलकनंदा तुम बहती जाना 
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अपने बृहद बाहुओं में 
भरकर जग का पीर 
अलमस्त ,अल्हड ,उच्श्रृंखल 
कलकल निनाद ,धीर - अधीर 
अलकनंदा तुम बहती जाना। 

प्रखर ऊर्जा ,वेग निर्बाध 
जन्मों का गिरहकट,तुम तारणहार 
एक डोर आस की ,बँधी साँस की  
अंतर्तम से है वंदन लिए पुष्पहार
 अलकनंदा तुम बहती जाना। 

तुम ज़िन्दगी की तपिश में 
बहा देती शीतल धार 
मत्परायण कर्म तुमको अर्पण 
शून्यप्राय प्राणी का कर उद्धार 
अलकनंदा तुम बहती जाना। 

छा रहा देखो गहन अंध 
टूट रहा है मर्यादा का तार 
तुम सत्य हो नश्वरत्व में 
फिर क्यों न सुन्दरतम जीवन सार 
 अलकनंदा तुम बहती जाना। 

तुम विजित ,हम ही पराजित 
रूप- पर्याय में गुण तुम नारी 
तुम सिद्ध हो ,हम भ्रमित 
अपनी अनुकम्पा का अल्पांश कर वारी 
अलकनंदा तुम बहती जाना।

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आज नया गीत लिखूँ
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नैनों की भाषा का मौन प्रतीक लिखूँ
जी चाहता है आज नया गीत लिखूँ।
 मन आँगन में गूंजता कलरव  पाखी का
रोम - रोम में नया स्फुरण सा लगता है
यूँ तो मौसम है अभी  पतझड़ का
पर हर शाख में वसंत दिखता है।
प्रियतम तुम्हारे जादुई सम्मोहन का
रग - रग में छलकता प्रीत लिखूँ
जी चाहता है आज नया गीत लिखूँ।
साँसों में गूँथ लिया तुम्हारे नाम को
दिन सुवासित ,रात महका सा रहता है
सिंदूरी आभ में रंग लिया भाल को
तन दहका मन बहका सा लगता है।
 इक तुम्हारे नाम की  मेहंदी
हाथों में रच मनमीत लिखूँ
जी चाहता है आज नया गीत लिखूँ।
मरुथल की वीरानियाँ थीं बिखरी
तुमसे मिल जीवन सरस लगता है
भेदकर कोहरा घना, धूप है निखरी
समय का फेर अनुकूल लगता है।
आ जाओ तोड़  रस्मो रिवाज़
जीने  का नया रीत लिखूँ
जी चाहता है आज नया गीत लिखूँ।

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आज का प्यार
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आज का प्यार
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कहने को तो प्यार
अब भी किये जाते हैं ,
पर नहीं आतीं अब गुलाबी शामें
नहीं आती रुत , मर - मिटने की अरमां थामे
इंतज़ार में पलकें बिछाए ,आँखों में खुमारी
लम्बे - लम्बे खतों में लिखी दिल की  बेकरारी
कहाँ मिलते जोड़े ,ज़माने की तोड़ पहरे
हाल - बेहाल और हवाइयाँ उड़ते चेहरे
नैनों की भाषा में होती थी बातें
बिखरे ज़ुल्फ़ों में बयांती बेचैन रातें
खट्टे - मीठे मुलाकातों का सिलसिला
अधरों में कंपकपांती ,इच्छाओं का जलजला
सब कुछ बदल गया
जब से मानव मशीन हो गया।
न चाहत रही न दिल में कशिश
समर्पण आकर्षण की दूर हुई ख़्वाहिश
कितनी अजीब बात है !
समय के घंटों में कोई बदलाव नहीं
मौसमों के आवागमन में कोई कटाव नहीं
फिर क्यूँ सर्द सा अहसास हुआ
सब कुछ उथला - उथला , क्षणिक हुआ
प्यार में बेहद थे सब  इरादे
 अब हद में भी प्यार न हुआ।

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