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सडकों में नपती हैं शहरों की दूरियां 
दिल के रिश्तों में कहाँ कमती दूरियां 

अहसासों को  बाँध लेते गर सीमाओं में 
फिर कहाँ सालती हमारे  बीच की दूरियां 

टूट जाता है सब्र का सैलाब कभी- कभी 
बारिशों  में जब जिय जलाती हैं दूरियां 

पहले तो पंछी भी पहुंचाते थे सन्देश
अब कहाँ रहे पंछी कि तय करें दूरियां

सीने में आग लेकर भी जी रहे मुकम्मल
इस  आग को और हवा देती हैं दूरियां...copyright kv

राजेंद्र कुमार  – (25 November 2015 at 23:32)  

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (27.11.2015) को "सहिष्णुता का अर्थ"(चर्चा अंक-2173) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, सादर...!

Ramaajay Sharma  – (26 November 2015 at 18:28)  

सुंदर अभिव्यक्ति

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