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अनचाहा मिल जाता है


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याद तुम्हारी जब आती है
हृदय सुमन खिल जाता है
जिसकी चाह नहीं मिलता वह
अनचाहा मिल जाता है ।
               हो नज़रों से दूर भले तुम
               मन में पर रहते तुम हो
               दुख – सुख के हर मंज़र पर भी
               आँखों से झरते तुम हो ।  
साथ के मौन संवादों से
उधड़ा मन सिल जाता है ।
                कोई शिकवा नहीं किसी से
                न इल्तिज़ा अरी ज़िंदगी
                हमनें तो हँसते – रोते की
                तेरी उम्र भर बंदगी ।
रुत वसंत के आते ही यह
मन अक्सर हिल जाता है ।
                   खुश हूँ जब से ठानी है
                   खुश रहना हर हालत में
                   सज़दे करती हूँ मंदिर में
                   रम कर छंदों – आयत में ।
द्वार प्रभु के ही टिकता पाँव
जब काँटों से छिल जाता है ।
                     क़ैद आज भी है आँखों में
                     मुलाकातों का वो गाँव
                     तेरी बाँहों के घेरे में
                     मिलती सुकूं की जो छांव ।
बड़े जतन से संभालूँ जब
पास तेरे दिल जाता है ।
जिसकी चाह नहीं मिलता वह
अनचाहा मिल जाता है ।

राजेंद्र कुमार  – (28 October 2015 at 23:55)  

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (30.10.2015) को "आलस्य और सफलता "(चर्चा अंक-2145) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, सादर...!

viram singh  – (29 October 2015 at 07:41)  

सुन्दर रचना
www.raajputanaculture.blogspot.com

Asha Joglekar  – (30 October 2015 at 14:51)  

सपने, देखने वालों के ही पूरे होते हैं।

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