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जिजीविषा


वसंत का मधुरस टिकता नहीं
पीयूष सावन का क्षणिक है
समय का प्रवाह रुकता नहीं
सुख का सागर  भी तनिक है ।

दिवसावसान की रक्तिमा देखो
जीवन का गूढ़ तत्व बतलाता है
एक - एक क्षण  पकड़ कर रखो
पर रेत सा मुट्ठी से फिसल जाता है ।

जिजीविषा बनी रहे चंद साँसों में
जिंदगी गुजर रही मेरे सामने से
उन्माद कम न हो देदीप्यमान आसों में
कुछ और कर गुजर जाऊँ ज़माने से ।

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             लक्ष्य

रवि को स्वयं की आग में
जल - जल कर ठंडक तलाशते
मैंने देखा है ।
जलधि को अपनी ही गहराई में
डूबते - उतराते तट तलाशते
मैंने देखा है ।
अम्बर को अपने ही विस्तार में
झुल-झुल कर सतह तलाशते
मैंने देखा है ।
भावनाओं के समंदर से उबरते
विचारों के मंथन से निकलते
मैंने जान लिया है -
मानव मात्र निमित्त है ।
स्व की खोज में निहित विधि है
अपने अस्तित्व की पहचान लक्ष्य है
यही सबसे बड़ी निधि है

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मेरी दुआएँ

अतीत के सागर से चुनकर लाई मोतियाँ
कुछ मीठे कुछ कड़वे पलों की स्मृतियाँ
बिखेर दिया है घर के कोने - कोने में
चमक रहीं हैं वो मन के सूने आँगन में

बच्चे मेरे दो फूल ,सुरभित करते बगिया मेरी
आदि मेरे दिन का अंत उनसे होती  रात मेरी
बचपन की अठखेलियों में रमता था मेरा मन
कालचक्र फिसलता गया रोकूँ कैसे कर जतन

पंख गए तब  नीड़ में खलबली होने लगी
घर का चौखट लाँघ उड़ने की हड़बड़ी होने लगी
अलगाव की पीड़ा को हमने गले लगा लिया
आँखों का  नीर चुपचाप ही बह जाने दिया

जो होते मायूस लाडले ,कभी जीवन की मंझधार में
थाम लेती कश्ती मैं ,बुलंद हौसला होता पतवार में
बिछोह में जाना मोह जाल सचमुच जटिल होता है
आंच आये कभी तुमपे दिल यही दुआ मांगता है

दरख्तों की झुरमुटों में झाँकता भास्कर  मेरा मीत
थाम लेता विह्वल मन और बतलाता जीवन रीत
भोर का पंथी धुन में मग्न ,झेले कितनी ही भीड़
लौट आता पर शाम को ,श्रांत -क्लांत अपनी ही नीड़

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बदलते रिश्ते


हमराही बन चलते -चलते रिश्ते बदल जाते हैं
जाने कब अज़ीज़  भी अजनबी  बन जाते हैं ।
शिकवाओं की फेहरिस्त बनाना हमने छोड़ दिया
दरकती हुई चट्टान को संभालना सीख लिया ।

खिलौनों की कीमत जो कौड़ियों में आँकता है
उसे नहीं पता ,खिलौनों में भी दिल धड़कता है ।
दिल के टूटने की गर आवाज़ होती
वज्रपात की विध्वंशता तब दिखाई देती ।

जीवन के दोराहे पर कोई नहीं साथ मेरे
 मेरा साया है सुख - दुःख में साथ मेरे ।
वक़्त की मांग पर वह भी घटता- बढ़ता है
 रात घिरते ही साथ छोड़ बेवफा हो जाता है ।

किसका एतबार करूँ फरेबी हैं सब यहाँ
तुम व्यूह रचाते जाओ ,मैं अभिमन्यु यहाँ ।
मेरी इंतहा लेते- लेते  फौलाद बना दिया तुमने
ऋणी हूँ कि व्यूह भेदन के योग्य बना दिया तुमने ।

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तुम्हारी कस्तूरी मैं


                                         तुम्हारी  कस्तूरी मैं

ख़ामोशी उस दुपहरिया की बड़ी चुभती है
जब काया से छोटी छाया दिखती है ।
सुनसान वादियाँ पलक पाँवड़े राहें तकती हैं
कोई तो है जिनसे गलियाँ गुलज़ार होती हैं ।

मदमस्त बहार तोड़ हर बंधन आता -जाता है
आज सुखाड़ रुलाता तो कल सावन बरसाता है ।
प्रभात की हर बेला तम को देती मात है
पर कटती नहीं मेरी बड़ी लम्बी रात है ।

भीड़ भरी संगत भी दिल को लुभाती नहीं
शब्दों के तीर चलते कभी खुद से खुद को बचाती।
 तोड़ हर संशय बना लो अपनी कस्तूरी मेरे मृग
प्रेम का दरिया बह उठे ,मैं गुलाब तुम भृंग ।

जो तुम चाँद होते अम्बर की सुनी काली रात का
पागल प्रेमी सी उठती - गिरती बन ज्वार समंदर का ।
साहिल पर जब पसर जाऊँ तुम किरण जाल फैलाना
स्पर्श आह्लाद अमिट होगा पराकाष्ठा प्रेम का दिखलाना ।

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    नीलकंठ तुम कहलाते हो


   दूब के गलीचे की मैं शबनम हूँ    
  बन रवि - किरण तुम आते हो ।
पल भर में ,विलीन हो जाती हूँ 
तुम एकत्व कर ,विस्तार मुझे दिलाते हो ।

हरसिंगार की महक बन मैं इठलाती हूँ 
बन हवा  का झोंका तुम आते हो ।
उड़कर मैं ,क्षण में घुल जाती हूँ 
तुम आत्मसात कर ,अस्तित्व बोध कराते हो ।

ईशतुल्य नहीं मैं ,नश्वर जीवन में पूर्ण 
आह्लादित कर मुझको ,आत्म -तुष्टि तुम पाते हो ।
चाहे रखो शीर्ष पर ,चाहे बना दो तृण
गरलपान करते मेरे लिए ,नीलकंठ तुम कहलाते हो ।

भला क्यूँ मैं चाहूँ गुरु ज्ञान 
मुक्तिबोध तुम दिलाते हो ।
आत्मा का परमात्मा से मिलन 
वह परमानन्द रोज़ कराते हो ।

देह्लोक की परिधि में ही 
अहसास अलौकिक तुम कराते हो ।
इसी एकांश को आतुर मैं ,तुम ही 
जीव वसन बारम्बार पहनाते हो ।

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               चुनौती

मानव तुम्हारी कल्पना , बहुत गहरी और प्रशस्त
 उतार लाओ इसे जीवंत ,बन जाओ सशक्त
तोड़कर शिला बना लो पथ ,प्रवाह नदी का मोड़ दो
 फाड़कर हृदय गगन का ,गर्भ धरा का चीर दो ।
आयें विपदा असंख्य ,चाहे मार्ग हो जाएँ अवरुद्ध
 हो न कभी निराश ,तुम हो जीव प्रबुद्ध ।
खड़ा हिमालय दे रहा चुनौती छू  लो मेरे ताज को
तुम वीर , अंजनिपुत्र ,रोक लो हवा के वेग को ।
कहते हैं सबल का साथ सभी देते
 नहीं कोई निर्बल का गुण गाते ।
एक कदम तुम बढाओ मानव ,फासले न रहें शेष
क़ैद हो जाए आकाश मुट्ठी में ,भाग्य न होता विशेष ।
तुम रहो अग्रसर निरंतर ,कर्म को मान आधार
जीव तुम ब्रह्मपुत्र  हो ,शक्ति तुममे अपरंपार।
ठान लो मन में तो ,दशाएँ  नक्षत्र की बदल जाएँ
 देव कहाँ फिर स्वर्ग में ,वो  धरा पर अवतरित हो जाएँ ।

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