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             लक्ष्य

रवि को स्वयं की आग में
जल - जल कर ठंडक तलाशते
मैंने देखा है ।
जलधि को अपनी ही गहराई में
डूबते - उतराते तट तलाशते
मैंने देखा है ।
अम्बर को अपने ही विस्तार में
झुल-झुल कर सतह तलाशते
मैंने देखा है ।
भावनाओं के समंदर से उबरते
विचारों के मंथन से निकलते
मैंने जान लिया है -
मानव मात्र निमित्त है ।
स्व की खोज में निहित विधि है
अपने अस्तित्व की पहचान लक्ष्य है
यही सबसे बड़ी निधि है

रविकर फैजाबादी  – (20 April 2012 at 05:17)  

बहुत सुन्दर |
बधाई ||

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