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अलकनंदा तुम बहती जाना 
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अपने बृहद बाहुओं में 
भरकर जग का पीर 
अलमस्त ,अल्हड ,उच्श्रृंखल 
कलकल निनाद ,धीर - अधीर 
अलकनंदा तुम बहती जाना। 

प्रखर ऊर्जा ,वेग निर्बाध 
जन्मों का गिरहकट,तुम तारणहार 
एक डोर आस की ,बँधी साँस की  
अंतर्तम से है वंदन लिए पुष्पहार
 अलकनंदा तुम बहती जाना। 

तुम ज़िन्दगी की तपिश में 
बहा देती शीतल धार 
मत्परायण कर्म तुमको अर्पण 
शून्यप्राय प्राणी का कर उद्धार 
अलकनंदा तुम बहती जाना। 

छा रहा देखो गहन अंध 
टूट रहा है मर्यादा का तार 
तुम सत्य हो नश्वरत्व में 
फिर क्यों न सुन्दरतम जीवन सार 
 अलकनंदा तुम बहती जाना। 

तुम विजित ,हम ही पराजित 
रूप- पर्याय में गुण तुम नारी 
तुम सिद्ध हो ,हम भ्रमित 
अपनी अनुकम्पा का अल्पांश कर वारी 
अलकनंदा तुम बहती जाना।

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