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अलकनंदा तुम बहती जाना 
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अपने बृहद बाहुओं में 
भरकर जग का पीर 
अलमस्त ,अल्हड ,उच्श्रृंखल 
कलकल निनाद ,धीर - अधीर 
अलकनंदा तुम बहती जाना। 

प्रखर ऊर्जा ,वेग निर्बाध 
जन्मों का गिरहकट,तुम तारणहार 
एक डोर आस की ,बँधी साँस की  
अंतर्तम से है वंदन लिए पुष्पहार
 अलकनंदा तुम बहती जाना। 

तुम ज़िन्दगी की तपिश में 
बहा देती शीतल धार 
मत्परायण कर्म तुमको अर्पण 
शून्यप्राय प्राणी का कर उद्धार 
अलकनंदा तुम बहती जाना। 

छा रहा देखो गहन अंध 
टूट रहा है मर्यादा का तार 
तुम सत्य हो नश्वरत्व में 
फिर क्यों न सुन्दरतम जीवन सार 
 अलकनंदा तुम बहती जाना। 

तुम विजित ,हम ही पराजित 
रूप- पर्याय में गुण तुम नारी 
तुम सिद्ध हो ,हम भ्रमित 
अपनी अनुकम्पा का अल्पांश कर वारी 
अलकनंदा तुम बहती जाना।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक  – (5 June 2015 at 05:19)  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (06-06-2015) को "विश्व पर्यावरण दिवस" (चर्चा अंक-1998) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
विश्व पर्यावरण दिवस की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

Onkar  – (6 June 2015 at 05:17)  

सुन्दर रचना

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