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तुम नज़्म मेरी


                         तुम नज़्म मेरी    

 लताओं सी नाज़ुक यादें जब गहराने लगती हैं
 फि़ज़ां की खुशबू कुछ जानी पहचानी सी लगती है ।
ज़माने की हमदर्दी जब शूल बन जाती है
वेदना ,शब्द बन पन्नों पर उतर जाती है ।
अल्फाज़ जो लब पर आते नहीं हैं
सिसकियों से नाता जोड़ लेते हैं ।
उम्मीदों के पुल जब ध्वस्त हो जाते हैं
अश्क गले से घूँट बनकर उतरते हैं ।
नदी का दो पाट बनना, जी को  डराते हैं
बूँदों को संजोकर चलो, मेघ बन जाते हैं  ।
मेरी ख़ामोशी में टिकी है सब्र की नींव
नाज़ुक है ,झेल नहीं सकती आवेश तीव्र ।
चाहे आदेश समझो या मान रख लो अर्ज़ का   
तुमसे ही बँधी साँस  तुम इलाज मेरे मर्ज़ का ।
दरवाज़े पर मेरे धीमे से दे दो दस्तक
तुम हो नज़्म मेरी, गूँज उठे सुर सप्तक ।

sangita  – (15 February 2012 at 07:46)  

shandar post hae bdhai..........

vidya  – (15 February 2012 at 09:52)  

बहुत सुन्दर भाव ...

veerubhai  – (15 February 2012 at 20:40)  

दरवाज़े पर मेरे धीमे से दे दो दस्तक
तुम हो नज़्म मेरी, गूँज उठे सुर सप्तक ।
बहतरीन अंदाज़ की नज्म दिलखुश नज्म दिलखुश अंदाज़ -ए -बयाँ .

दिलबाग विर्क  – (15 February 2012 at 23:37)  

आपकी पोस्ट चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें
http://charchamanch.blogspot.com
चर्चा मंच-791:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

कविता विकास  – (16 February 2012 at 04:17)  

आप सभी को ये रचना अच्छी लगी ,मैं बड़ी खुशनसीब हूँ कि अगली प्रस्तुति के लिए प्रेरणा मिल गयी ।आप के प्रोत्साहन से ही कुछ लिख पाती हूँ । आभार ।
dilbagji ने चर्चा मंच पे लगा कर मुझे surprise ही दे दिया, धन्यवाद

कविता रावत  – (16 February 2012 at 04:31)  

दरवाज़े पर मेरे धीमे से दे दो दस्तक
तुम हो नज़्म मेरी, गूँज उठे सुर सप्तक ।
..bahut sundar dhang se dil ke sur mukhar karti rachna....

***Punam***  – (16 February 2012 at 05:49)  

ज़माने की हमदर्दी जब शूल बन जाती है
वेदना ,शब्द बन पन्नों पर उतर जाती है ।

खूबसूरत अंदाज़.....

कविता विकास  – (17 February 2012 at 02:59)  

punamji aur kavita rawatji ko mera hardik dhanywad aapki pratikriyaen mere liye margdarshak hain.

prakriti  – (27 March 2012 at 08:56)  

BAHUT SUNDAR ABHIVYAKTI ! NISANDEH BAHUT SUNDAR LIKHTI HAIN AAP !

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