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     तन्हा सफ़र चाँद का 

वक़्त है ,मौसम - ए - बहार का  
फिज़ाओं में रंग भरने का
 तन्हा - तन्हा जीवन में 
मुहब्बत ही मुहब्बत भरने का ।
अब तो ,धड़कनों पर राज़ का 
सपनों पर अधिकार किसी का 
मेंहदी रचे हथेलियों में 
शर्मा कर चेहरा छुपाने का ।
अमोल है ,जुड़ना दिल के स्पंदनों का 
बहकना शाम की रंगीनियों का 
दुनिया की स्नेहल भीड़ में 
अहसास अकेला होने का ।
रुत है ,दरिया -ए -इश्क में बहने का 
इश्क की आग में जलने का 
हाल -ए -दिल बयां करने में 
घबरा कर होंठों को काटने का ।
देखा है एक जोड़ा हंसों का 
कसमें लेते जीने - मरने का 
ठहर कर छत की मुंडेर पे 
पैगाम दे जाते ,मुझ सा उनके हाल का ।
बोझिल है ,तन्हा सफ़र चाँद का 
थका -थका ,तलाश हमसफ़र का 
टिक कर खिड़की के एक कोने पे 
प्रयास है मुझे  अपना बनाने का ।
अजीब है आलम बेचारगी का 
अंदाज़ जुदा है जीते - जी मरने का 
उस एक ने नूर भरा जीवन में 
जवाब नहीं मेरे दिलबर का ।

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  वसंत झूमता है 

शीतोष्ण का संधिकाल 
बेहद रोमांचक होता है 
एक ओर शरद का उठता साया 
दूसरी ओर ग्रीष्म से जुड़ता नाता 
और ,बीच में वसंत झूमता है ।
नव पल्लव ,नव किसलय 
नव पुष्प में ऋतुराज खिलता है
 बौराई पवन अपने वेग में 
कभी सरसों हिलाती 
कभी महुआ गिराती 
पीत वर्ण की सज्जा बागों में    
सेज मनमोहक सजाती  है ।
आमों में मंजर फूटते 
 लसलसायी सी झुकती - गिरती 
भ्रमरों की टोलियाँ 
रसपान को होड़ लगाती 
कोयल की सुमधुर कूक 
पपीहे की मचलती सी हूक
नीरवता में यूँ गूंजती है 
प्रकृति ने जैसे सुर - सरगम छेड़ी है ।
शुष्क बयार का अंदाज़ अनोखा 
कभी अमलतास में खोता 
कभी गुलमोहर को उड़ाता
खुशबुओं से हो लबरेज 
बदन की सिहरन में भी गुदगुदाता 
बिरहन की अगन लहकाता
मन ही मन मुस्काता है ।
वसंत अपने अल्पावधि में 
सर्वत्र जीवंतता भर देता है 
चतुर्दिक बिखेर रंगत अपनी 
पर - पीड़ा हर लेता है 
नयनाभिराम वह, सुखसिंधु बन 
दिल में हिलोरें भरता है और
प्रकृति का  सन्देश यह बतलाता है 
 कि अगर शरद रुलाता है 
तो क्या वसंत नहीं झुमाता है ?  

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  दार्शनिक  साँझ 

क्षितिज पर ढलता सूरज 
गुलाबी आसमां
नारंगी ,मटमैली किरणें 
क्षीण सी ,निस्तेज 
धूमिल दिशाएँ 
कैसी सुन्दर साँझ ।
नीड़ को आतुर 
व्याकुल खगदल
थकी सी कलरव 
श्रांत क्लांत तन 
गोधुली बेला 
मनमोहक सांझ ।
भोर से था विभोर
पंक में उद्भाषित 
छेड़ता सौन्दर्य -गान 
लाल -सफ़ेद पद्म 
मुंद रहा आँखें 
दार्शनिक साँझ ।
हाथों में हाथ डाले
 खुशियों में सराबोर 
क्रीड़ाओं से निवृत 
आ रहे शिशु विकल 
माँ को लुभाने 
खूब रिझाती सांझ ।
सुबहा चलने का नाम 
सांझ है प्रतीक विराम 
अनवरत यह फेरा 
चराचर को बाँधे
आती - जाती 
उपदेशक सांझ ।
समय का फेर 
होता बड़ा बलवान 
स्वयंभू है बदलाव 
जीवन के मेले में 
आज सुबह है 
कल अवश्यम्भावी सांझ ।

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        तुम तक पहुँच पाऊं
दरख्तों को चीरतीं किरणें चपल 
सुमधुर ,सुस्मित कीच बीच कमल 
विवस्त्र द्रुमों में हिलता एक पल्लव 
अलसाई भोर को चीरता  खग - कलरव 
जाने किन - किन रूपों में बसते हो नाथ 
हर पल रहते पास ,फिर भी मैं अनाथ 
कभी तो दरस दिखला जाओ सर्वाधार 
मिट जाए जन्मों का फेर हो एकाकार ।
भर दो भावों की सरिता विमल 
पावन तन से सजाऊँ तेरा आसन निर्मल 
दुःख के बवंडर से न टूटे आस्था 
वंदन में तुम्हारी  नित झुके माथा 
निष्ठुर आशाएँ चाहे जितनी बहलायें 
मृगमरीचिका सी चाहे जितनी झुठलायें 
थाम लेना नाथ जो हो जाऊं विचल 
नेह का दीपक जलता रहे प्रतिपल ।
मोहपाश में जकड़ी यह दुर्बल काया
नासमझ मन जाने नहीं जग की माया 
अथ के साथ रचा है तुमने इति
नश्वर देह से प्रेम छलता है मति 
जाना है छोड़ सब सम्पदा व रिश्ते -नाते 
शाश्वत यह सच ,काश हम अपना पाते 
झुलस जाता है मन उद्वेग - अगन में 
 बरस जाओ पीयूष सा ,रेत की तपन में।
तुम ही हो साधना ,तुम बनाते  साध्य 
तुम हो आराधना ,तुम ही रचते आराध्य 
हर भेद जानूँ, फिर भी अज्ञानी कहलाऊं
भ्रांतियों में लिप्त हूँ ,तभी मानव कहलाऊं 
ईप्साएँ अनंत बंधी हैं हर सांस में 
कैसे विमुक्त होऊं,उपाय किस ध्यान में 
विनत प्रार्थना है नाथ ,विषय - जाल बेध पाऊं 
रोशन कर  तम चित्त का ,तुम तक पहुँच पाऊं।

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          जीवन अमृत

तमाम झंझावातों के उठा - पटक में भी 
ज़िन्दगी ,तुम खूब भाती हो 
हर घड़ी इंतहा लेने की जिद 
तुम्हारी कम नहीं हुई 
हर जिद में खरा उतरते - उतरते
मैं भी जीवट हो गई।
विस्मृत नहीं हुईं  हैं वो शोखियाँ 
रिश्तों की तपिश ,मासूम गलतियाँ
क्या खोया ,क्या पाया का मकड़जाल
चाह कर भी उलझा नहीं पाता है 
थपेड़ों की मार  जैसे साहिल गले लगाता 
मैंने भी हर चोट बखूबी सहेजा  है ।
गिरकर संभलने की फितरत 
अब तो आरज़ू बन गई है 
अंगार पर चलूँ या आँधियों के मध्य 
चुनौतियों का निमंत्रण हरदम स्वीकारा है 
फिर भी ,हम शतरंज की शह - मात नहीं 
जिंदगी मैंने तुम्हे बेहद प्यार किया है ।
अनुभवों की भारी पोटली लिए 
मूल्यांकन करती जीवन चक्र का 
जीवन की संध्या ढलता सूर्य भले हो 
पर सुनहरी सुबहा का भी संदेशा है 
फूलों की डालियाँ काँटे भी संजोए है 
यथार्थ यही जीवन अमृत में पाया है ।

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                 बचपन 
चाँद - तारों को झोली में भर 
घरौंदों में सुनहरी आभा कर 
परियों संग आँख - मिचौली खेलना 
शहजादों संग गुड़ियों का ब्याह रचाना 
क्या खूब भाता था ।
डर नहीं कोई रात की स्याही से 
नियमों में बंधने की पाबंदियों से 
रेत का महल बनाना
फिर ढहढहा कर गिरा देना 
नश्वरता का मानो भान था ।
बारिशों में भींगने की चहक 
बुलबुलों को थामने की ललक 
कागज़ की नावों को चलाना 
फिर छलांगें लगा छीटें उड़ाना
क्या स्वर्गिक सुख था। 
अरमानों का पनपा नहीं बीज था 
जो मिला बस वही अपना था 
माँ की आँचल में सिमट जाना 
लोरियों की तान में खो जाना 
दुनिया का यही मतलब था ।
समय फिसलता - सरकता गया 
बचपन हाथों से निकलता गया 
उम्र की दहलीज पर खड़ा होना 
फिर पलट कर पीछे देखना 
बहुत ललचाता है ।
छोटी -छोटी खुशियों वाला बचपन 
मुट्ठियों में बंद सपनों वाला बचपन 
जब भी मन खाली  होता है 
अनायास आँखों में छलक पड़ता है
 एक मधुर स्मृति बन कर  ।

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              विश्वास 
मधुर से इस शब्द की टंकार
रूह से रूह को जोड़ती है 
रिश्तों के फलने का है यह आधार 
वरना जीवन नासूर बन जाती है ।
वर्षों तक साथ रहना 
महज एक औपचारिकता है 
गर न हो विश्वास का सेतु 
तो ज़ख्मों का रिसाव स्वाभाविक है। 
विश्वास की बुनियाद जब हिल जाती है 
रिश्तों की गाँठ तब न खुल पाती है 
विवाह होता है सात जन्मों का बंधन 
तभी जब विश्वास की चासनी में घुले हों 
नहीं तो एक जन्म ही 
सात जन्मों का भार बन जाता है ।
विश्वास है जीवन की धुरी 
जहां न पनपता वहाँ 
रहती है रिश्तों में दूरी 
विश्वास से प्रेम है 
प्रेम से भाव है 
भाव से जीवन की  कविता है ।
विश्वास के खाद से ही 
कब्र पर खिली - खिली घास है 
जिसके कोमल अहसास से 
बिछोह के दमघोंटू क्षण पाते साँस हैं ।
वरना अविश्वास के कंटक तो 
केवल छलते और खुद को छलाते  हैं ।

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                  वर्तमान 
वर्तमान का अस्तित्व बिंदु 
दोनों तरफ योजक चिह्नके साथ 
बीचो -बीच रहा है ।
एक तरफ अतीत को जोड़ता 
दूसरी तरफ भविष्य को टटोलता 
वह खड़ा होता है चौराहे पर 
दाएं -बाएं ,आगे - पीछे 
सब ओर बाँहें फैलाए 
अतीत की स्मृतियाँ और 
भविष्य के सपनों को जोड़ने वाला 
एकमात्र सूत्र वर्तमान ही है ।
वो सपने जो हैं समाज का आधार 
अतीत से लेकर हथियार 
गढ़ते जाते हैं वर्तमान की धार 
वर्तमान संवेद सपनों को भी गढ़ता है 
अतीत की सीढ़ी पर चढ़ 
भविष्य को बुनता है ।
वर्तमान के पास विशेषाधिकार है 
कल की विध्वंशता पर सृजन कर 
आशा के फूल खिलाता है ।
और सृजनात्मकता पर संतोष की बयार 
बहाकर कर्मठ बनाता है ।
भविष्य वर्तमान बनने की 
जद्दोजहद में बार - बार इससे जुड़ता है 
पर विडंबना तो देखो 
जिस दिन भविष्य इससे मिलता है 
वर्तमान अतीत बन जाता है ।
शायद इस बात की प्रभुता के लिए 
कि कोई किसी का साथ नहीं देता है 
हरेक काल की मानिंद मानव भी 
अकेला आया है ,अकेला जायेगा ।


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ग़ज़ल
                        ज़र्रा - ज़र्रा नम है
                      ------------------------------
दिन -रात आँखों में ख्वाब होते हैं
कमाल - ए - इश्क  लाजवाब होते हैं ।

अहसास बन जो रूह में उतरते हैं
सिहरनों में उनकी हम ढलते जाते हैं ।

अक्स तुम्हारी खुशबू बन महकती है
संभाले कोई, हम तो निढाल हुए जाते हैं ।

बार - बार ख़त लिख कर फाड़ डालते हैं
इश्क की परीक्षा में इसलिए उलझते जाते हैं ।

राख़ पर चल दें हम तो वो भी सुलग जाए
हुस्न ऐसा बेमिसाल कि मगरूर हुए जाते हैं।

धुआँ- धुआँ है आसमां ज़र्रा - ज़र्रा नम  है
एक मदहोश  है ,एक पानी -पानी हुआ जाए ।

बेतरतीब है आलम ,क्या दिन क्या रात
फिसलती ज़ुबां पर होती सिर्फ हमारी बात ।

अब तो बदनामियों से भी  डर नहीं लगता है
लगता है इश्क के उस मुकाम को हमने पा लिया है ।


           

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  मैंने मर - मर कर जीया है 

बेशुमार शिकायतों को सीने में दबाए
 नफ़ीस मुस्कान को मैंने गले लगाया है ।
अपने  हज़रत को नज़र ना लग जाए 
हर झरोखे पे मैंने पर्दा चढ़ाया है ।

बहारें टिकी हैं मौसम के मिज़ाज पे 
मेरे बहार का ठौर मैंने तुममे पाया है ।
तुम्हारे दो पल के साथ की आरज़ू में 
कितनी रातें मैंने आँखों में बितायी है ।

पर काट परिंदे को छोड़ दिया उड़ने को 
हाशिये पर रह मैंने अस्तित्व संभाला है ।
तुम उधेड़ते रहे जीवन के पन्ने को 
समेटने में उन्हें मैंने उम्र गुज़ारा है ।

शब्दों के तीर चलते ज़माने की चर्चाओं में 
हर ज़ख्म को मैंने फूल की  मानिंद सहेजा है ।
तुम्हारी बुलंदियों का राज़ है मेरी मन्नतों में 
हर मज़ार पर मैंने चादर  चढ़ायी है।

मुज़तर कर  रम गए प्यार के व्यापार में 
घूँट ज़हर का मैंने अमृत सरीखा पीया है ।
तुम्हारी फंतासी दुनिया के तिलस्म में 
कितनी बार मैंने  मर - मर कर जीया है ।

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                       इंतज़ार 
तुम्हें पता है  न ,इंतज़ार का आलम 
अगन - कुंड में जलने जैसा  होता है
वह  आग जिस पर पानी भी 
नहीं डाला जा सकता है  
किसी की दुआ और सहानुभूति 
कारगार नही होती है 
हर आहट पर चौंक कर पलटना 
हर ध्वनि पे उस पहचानी सी आवाज़ को तलाशना 
बिन पलकें झपकाए हर अपरिचित साए को भाँपना
बेचैनी के साथ शर्मिंदगी भरा भी होता है 
और वह बेरहम पल जो आगे बढ़ता ही नहीं 
मानो  समय नहीं ,युग बीत रहा हो 
जज़्बातों की दौड़  इस होड़ में कि
पहले मैं  निकलूं ,पहले मैं 
शिराओं की तंग  नलियों में उत्पात 
मचाने लगती है 
चेहरे की लालिमा एक अज्ञात भय से 
नीली - काली होने लगती है 
कभी सीढियां ,कभी बालकोनी ,कभी खिड़की 
शायद  ही कोई जगह हो जहाँ
पैर न खींचे चले जाते हों 
और जब इंतज़ार की घड़ियाँ ख़त्म होती हैं 
तब मानों लावा बिखेर कर 
ज्वालामुखी शांत हो गया हो 
न कोई शब्द फूटते ,न बोली 
केवल आँखें बोलती हैं 
कुछ शिकायतें ,कुछ इनायतें 
ख़ामोशी से मुखर पड़ते हैं 
घड़ी की सुइयों की रफ़्तार तो देखो 
बिन हाँफे दौड़ती जाती हैं 
जुदाई की बेला चौखट  पर आ खड़ी होती है 
तुम्हे साथ ले जाने को 
और मुझे एक नए इंतज़ार में छोड़ जाने को ।

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                      स्त्री 

जीने का सलीका सीखने वाली 
परिवार की धुरी बन जिलाने वाली 
स्त्री ,कितने रूपों में तुमने जीया है ?
बेटी बन कर बाबुल की गोद में फुदकती 
घर - आँगन की शोभा तुमसे सजती 
तुम सौभाग्य का प्रतीक बन जाती 
और एक दिन अपने ही चौखट के लिए 
परायी बन जाती 
फिर आरम्भ होता तुम्हारा नवावतार
चुटकी भर सिंदुर की गरिमा में 
बलिदान कर देती अपना अस्तित्व 
अन्नपूर्णा बन बृहद हो जाता व्यक्तित्व 
दुःख की बदली में तुम सूर्य बन जाती 
हर प्रहार की ढाल बन जाती 
और जिस दिन वंश तुमसे बढ़ता 
तुम स्त्रीत्व की पूर्णता को पाती 
माँ की संज्ञा पाते ही वृक्ष सा झुक जाती 
ममता ,माया ,दुलार एक सूत्र में पिरोती 
तुम ही लक्ष्मी ,तुम ही सरस्वती होती 
बेटी ,पत्नी और माँ  को जीते - जीते 
तुम जगदम्बा बन जाती 
इतने रूपों में भला कोई ढल पाया है ?
एक ही शरीर में इतनी आत्माओं को
 केवल तुमने  ही जीया है ।
पर कितनी शर्मनाक बात है ,
 अपनी ही कोख में तुम मार दी जाती हो !!!

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                    जिंदगी 
 शतरंज की बिसात सी ज़िन्दगी 
जब तक सपाट थी ,थी 
एक बार जो शुरू हुआ 
अपनों और गैरों के बीच द्वंद्व 
फिर तो शह और मात में ही 
उलझ कर रह गयी है ।

अनगिनत सवालों के भंवर में ज़िन्दगी 
जब तक जूझ रही थी ,थी 
एक बार जो बाहर निकल आयी 
तो  अपने ही शक्ति परीक्षण  पर उठा प्रश्नचिन्ह 
मुखौटों से लदे चेहरों की परिभाषा 
स्वयं ही रच रही है ।

शब्दों के मायने निकालने में ज़िन्दगी 
अपने ही चक्रव्यूह में घिर रही है 
सही - गलत के पैमाने बदल गए 
किंकर्त्तव्यविमुढ़ सी जड़ हो गयी 
सत्य हार गया और झूठ की आंधी 
रौंदती जा रही है। 

अपने ज़ख्मों पर मरहम लगाती ज़िन्दगी 
उदार और विशाल हो गयी है 
खुशियाँ छलावा हैं  
दुःख क्षणिक हैं 
महानिद्रा में समाने से पहले 
अनुभवों का क़र्ज़ चूका रही है ।

बेहिसाब दौड़ती - भागती ज़िन्दगी 
पसीने में तर - बतर है 
बंद रोशनदान की सुराख से आती 
मंद - मंद  पवन सहलाती है 
अब तो बोधिवृक्षों  की छाँव तलाशने में 
मेरे वक़्त की रफ़्तार जूझ रही है ।

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          धूप 
आँगन में उतरती हुई 
 नर्म ,गुनगुनी धूप 
बड़ी भली लगती है
 अलसाई सी दिनचर्या में 
अचनक रफ़्तार आ जाती है 
माँ की बड़ियाँ सूखने लगती हैं
 आर्द्र कपड़े गरमाने लगते हैं 
और जाने क्या - क्या ...
देखते ही देखते पूरा कुनबा 
आँगन में सिमट जाता 
बालों में तेल लगाने से लेकर 
बिटिया की मँगनी के दिन तय करने में 
चौपालें सजी रहतीं उसी   जगह 
मोहल्ले वाले भी जुटते जाते 
छोटी से छोटी ,बड़ी से बड़ी 
समस्याओं का हल 
धूप की गर्माहट से हो जाता ।

अब जब जाड़े की प्रातः में 
गज भर बालकोनी में 
छिटपुट धूप को पकड़ती हूँ 
कमरे से  आवाज़ आती है 
हॉट ब्लॉअर में आ जाओ न ..
मैं मायुसी से अन्दर जाते हुए सोचती हूँ 
तुम क्या जानो धूप क्या होती  है ?
धूप ,तुम सामाजिकता का पर्याय हो 
रिश्तों की नरमी का अहसास हो 
बचपन को संजोया चलचित्र हो
हम तो गमलों में पल रहे कैक्टस हैं 
सुखों की कँटीली बाड़ से घिरे हैं 
जिन प्रस्तर - प्राणों ने देखा नहीं आँगन 
वो क्या जाने धूप की गर्माहट क्या है। 

धूप  तुम तो अब भी वही हो 
 प्यारी सी ,नर्म ,गुनगुनी सी 
मन करता है झपट कर तुम्हें
अंजुरी में भर लूँ और डूबो दूँ 
अपने तन - मन को और 
जी लूँ अपने बचपन को 
या फिर फैला दूँ संकीर्णता से भरे 
कबूतरखाने जैसे महानगरीय फ्लैट 
के कोने - कोने में 
तुम्हारे गर्म अहसास भेदकर 
भावशून्य मन - मस्तिष्क को 
भर दे तुम जैसी गुनगुनी चमत्कार को ।


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     आसमां मेरे हिस्से का 

वृक्षों के छालों सा 
सांप की केंचुली सा 
पुराना आवरण बहुत भारी था 
मवाद के रिसाव सा  बदतर था ।
देखा छालों को गिरते 
समय की प्रवाह में बहते 
मैंने भी वह आवरण उतार दिया 
समय के साथ जीना सीख लिया ।
विरस पतझड़ पर सरस सावन सा
रात पर प्रभात की विजय सा 
मैंने अँगड़ाई लेना सीख लिया 
पथ के शूलों को फूल बना लिया। 
दर्द के दरिया से पा रही त्राण हूँ 
आखिर प्रकृति की अनमोल प्राण हूँ। 
कुंठाओं का परित्याग कर मन का द्वार खोल दिया 
हवाओं के आवागमन ने हर शिकन उड़ा दिया ।
कोहरे से छंटती भोर सा 
ओस की गुदगुदाती स्पर्श सा 
नर्म ,मखमली संसार रचा है 
और अपनी ही आभा बिखेर दिया है ।
गज  भर ज़मीं पैरों के नीचे  की 
बेहद मज़बूत हो गयी  है 
मुट्ठी भर आसमां मेरे हिस्से का 
इन्द्रधनुषी हो गया है ।

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           फलक पर 

तुम्हें फलक पर  ले जाऊँगा 
चाँद - तारों के बीच बसाऊंगा
एक ऐसी दुनिया जहाँ तिरोहित होंगे 
हर बाधा - प्रतिबन्ध  ।
उस आकाशगंगा को इंगित करते 
तुम्हारे शब्द अमृत घोल रहे थे 
मैंने तो फलक पे अपना 
ताजमहल भी देख लिया था ।
जो तुमने मेरे जीते -जी बनाया था 
तब क्या पता था प्यार की नींव 
बलुवाही मिट्टी पे टिकी है 
विश्वास को डगमगाते देर न लगी 
और तमाम आरोप - प्रत्यारोपों  की आँधी
ध्वस्त कर गयी वो ताजमहल 
सब दफ़न हो गए वो वादे ,इरादे 
और प्यार करने वाली दो आत्माएँ।
मेरी किताबों में रखी लाल गुलाब की पंखुरियाँ
सुख कर भी महकती हैं 
शायद हमारे खुशनुमा पलों की एकमात्र निशानी 
अब भी हमारे वजूद को जी रही हैं ।

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    •               मन

      मन तू बड़ा बावला है
      ज़माने के दस्तूर को कर दरकिनार
      अपना ही आयाम रचता है
      कभी आवारा बादल बन जाता है
      कभी आँखों की कोर से बह जाता है ।
      मन तू थोडा सरस भी है
      समय की आँधियों में उड़ा नहीं है
      रिश्तों की उपालंभों से मरा नहीं है
      जिम्मेदारियों के बोझ तले दबा नहीं है
      अब भी वहाँ प्यार का अंकुर खिलता है
      जो किसी को सँवार सकता है
      किसी के लिए बिखर सकता है ।
      मन तू कितना बेबस है
      चाह कर भी हँस नहीं सकता
      जज़्बातों की ज्वालामुखी में अंतर्धान
      अपनी मर्ज़ी से फट भी नहीं सकता
      और तो और ,मुस्कुराने से पहले
      आस - पास का जायजा लेता है ।
      मन तू शातिर भी कम नहीं
      भीड़ भरे रास्तों में गुदगुदाता है
      एकांत में टीसें मारता तड़पाता है
      बार - बार उनके ख्यालों से उकसाता है
      और ,जो उठा लूँ कलम लिखने को ख़त
      शब्दों में स्वयं ढल जाता है ।
      मेरा हमराज ,तू आज़ाद पंछी है
      पिंजरबद्ध हो ही नहीं सकता
      चलो ,तुममें ही विलीन हो जाऊं
      हर उस मुकाम तक पहुँच जाऊं
      जहाँ सशरीर न जा पाऊं ।

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पारिजात बहक जाएँ

बारिशों आज थमना रात भर
आये हैं वो बड़े तलब से मेरे शहर
मेघों से नीर ले लो अगले बरस का
रुक कर चुका जाएँ वो उधार मुद्दत का
हवाओं तुमसे ज़रा तेज बहने की गुज़ारिश है
बहारों के शबाब में मेरे अक्स की नुमाइश है
कि बेमौसम खिल उठे पारिजात बहक जाएँ
खुशबुओं से लबरेज फिजां क़यामत ढा जाएँ
सुना है मेरी गली से आज वो गुजरने वाले हैं
मेरी दीवारों पर शीशे के कतरे लगे हैं
या खुदा मेरी आँखों को झपकने देना
हर कतरे की मूरत मेरे ज़ेहन में उतार देना
साँसों की रफ़्तार में तरन्नुम सजने लगी
बेवज़हा होंठों पे तबस्सुम थिरकने लगी
एक बार उनकी नज़रें इनायत हो जाएँ
मुद्दतों की ख़लिश पल भर में मिट जाए।

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 वह  सर्वज्ञ है

उस सर्वेश्वर सत्य की खोज में 
जब -जब जूझती हूँ 
एक अखंडित मृग मरीचिका में 
उलझती जाती हूँ ।
तुम अद्वितीय ,अनंत ,अनुपम हो 
पर किसने देखा है यह रूप तुम्हारा,
जब तुम निराकार ,अजन्मा कहलाते हो ?
जानती हूँ जैसी अनुभूति वैसी मूर्ति ।
हर विधा में ढल जाते हो 
कहीं धुंध को चीरती किरण हो 
कहीं तिमिर को भेदती बाती हो 
कहीं राधा के किशन हो 
कहीं मीरा के श्याम हो 
सुना है हर युग में तुम्हारा पदार्पण
 भक्तों की निरीह पुकार पे हुआ है ।
पाप का बोझ जहां बढ़ा 
तुम तारण को आ जाते हो ।
द्रौपदी को तारने वाले सुदर्शन प्रिय 
नहीं हो रहा क्यों आज जग का श्रिय?
कितनी द्रौपदियां लुट रहीं यत्र - तत्र हैं
विछिन्न मन- प्राण घायल सर्वत्र है 
पाप का आवरण हो रहा घना है ।
 अब तो आ जाओ नाथ 
धवल चाँदनी सा सहला जाओ 
द्वंद्व नहीं कोई तुम्हारे अस्तित्व पर 
पर निर्द्वंद्व भी नहीं 
छोड़ दिया है नाव बिन पतवार के 
चाहे थाम लो चाहे बहने दो धार में 
जिस घड़ी ठहर जाऊं बिन ह्रास के 
समझ जाऊं वह  सर्वज्ञ है पास में ।

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तुम सावन मैं बदली 

सावन जब - जब तुमने चाहा
मैं बदली बन जाती हूँ 
निःशब्द मौन निमंत्रण में तुम्हारे 
आत्म - विसर्जन कर जाती हूँ ।

बारिश की मोतियाँ चुन कर 
जीवन अपना सरस बना लेते  हो 
मन की सुखी डालों पर पुष्पित कर 
मुझे निःशेष बना देते हो ।

मास दर मास कैसे बीते बताओ ज़रा 
विरह अगन में छोड़ दिया जलने को 
अगले बरस तक तपा कर धरा 
पुनः बदली बन बरसने को ।

एक जुस्तजू है सावन पिय की 
भूल न जाना मुझे लम्बी दूरियों में 
बेमौसम देखो जब एक टुकड़ी बादल की
 समझ लेना रात बीती है अँखियों में ।

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  वो उड़ चली है 

मेरे लिए 
घड़ी की सुइयाँ स्वतः नहीं चली हैं
 वार्डन ने तय किया था पैमाना
 कहाँ जाऊं,क्या करूँ ,कब आऊँ 
फिर भी इस बंधन को खूब जीया है
कोई शिकवा नहीं ,कोई गम नहीं 
शायद उतनी सी परिधि में 
अपना आकाश तलाशा था 
दरवाज़ों नहीं खिड़की से झाँका था  
एक ही दिशा को क्षितिज माना था 
इसी बुनियाद पर व्यक्तित्व की इमारत गढ़ी
अपरिमित भावों के सागर में 
डूबते - उतराते जब थक गयी 
तो कविता मुखर होने लगी 
मेरी तरह छंदों के दायरे में बँधी
कभी लगता भावों की कसमसाहट में 
दम तोड़ रही है कविता  कुलबुलाहट में 
फिर भी वह गीत बन उतरती रही 
जाने - अनजाने होंठों पे सजती रही 
पर अब मैंने ठान लिया है 
अपनी संवेदनाओं को छंदबन्द्ध नहीं रखूंगी 
 पिंजरे के बाहर की दुनिया उसे देखने दूंगी 
पूरे गगन में बाँहें फैलाये उड़ने दूंगी 
और देखो ....वो उड़ चली है ...।

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 तुम  एक जुनून हो 

 कुछ खुशगवार लम्हों की महक 
साँसों में समां सीने तक उतर गयी है 
महफूज़ है  वह अहसास जिसकी  लहक 
सुलगा कर बदन तर - बतर कर गयी है ।

शब्दों में बहुत ढाला प्यार को 
फिर भी कविता नहीं बन पाई है 
लगता है उस अधूरेपन की कसक को 
खुदा ने भी खूब आजमाई है ।

आसमां की अरुणाई का नील रंग 
मेरे अश्क को तुममे संजोया है 
विलग कैसे हो सकता भला एक अंग 
जब दो रूहों ने साथ साथ साँसें बटोरा है ।

वो जिज्ञासा ,पिपासा और तन्हाई की रात 
बेतरतीब हैं आलम ,तुम एक जुनून हो 
सलवटें बता रहीं हैं करवटों की बात 
मेरी नज्मों की तुम मज़मून हो  ।

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     मैं शबरी बन जाऊं

मेरे अंतर्मन का महाकाश 
बाँध लो मुझे अपने पाश 
झेल चुकी जग का उपहास 
जब तुम न होते आस - पास ।
शून्य की प्रतिध्वनि हुंकार भरती
मन - प्राण विछिन्न हो विवशती
निराकाश से मुरली की तान निकलती 
निस्तत्व  प्राण में चेतना उमड़ती ।
विलय कर संशय का अतिरेक 
मधुमय जीवन का कर अभिषेक 
इहलोक में ईश्वरत्व का हो भान
मर्त्यमान जीवन में अनुराग का गान । 
विश्व के अधिष्ठाता एक है पुकार
राग - रंग के बंधन से हो उद्धार 
प्रियत्व बन पथ प्रशस्त करो देव 
निस्सार जीवन का सार बनो गुरुदेव।
 उत्कर्ष अभिप्राय हो जीवन मंत्र
जिसमे न क्लेश न द्वेष का तंत्र 
चराचर के बंधन से मुक्त हो जाऊँ
तुम बन जाओ राम मैं शबरी बन जाऊँ ।

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                  ठुकरा दिया  मैंने खुदा

बंद आँखों पे समझना न नींद का कहर 
धुंधला न जाएँ सपने सो पलकें गयीं हैं ठहर ।

खो गए हो दुनिया की भीड़ में छोड़ मेरा दामन
वक़्त थम गया ,बहारें रूठ गयीं छोड़ मेरा आँगन ।

हम तो बैठे हैं पहलु में भूल हर खता को 
किस गुनाह की सजा देते हो भूल मेरी सदा को ।

जीने का बहाना मिल गया उलझनों में तलाशते रास्ता
 वरन् फूल भरी जिंदगी के छलावे से होता बस वास्ता ।

अब भी खड़े हैं हम वहाँ रास्ते जहां से हुए जुदा 
इक तेरी सूरत के वास्ते ठुकरा दिया मैंने खुदा ।

मिल जाओ गर भागती जिंदगी की जद्दोजेहद में 
अजनबी सा ठिठक जाना पहचानी सी आहटों में ।

ढेर सारी यादों को देकर भूल जाने कहते हो 
मानों सागर में मिली अश्कों को ढूंढ़ लाने कहते हो ।

आपकी बेरुखी ने मुझे आपका कायल बना दिया
 आपकी तसव्वुफ़ से रेगिस्तान में सहरा बना दिया ।

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             मन का पंछी 


चाँद का तन्हा सफ़र कैसे देखूँ
अक्स उसकी बेचारगी का कैसे झेलूँ
कोई तो रंग बिखेर दे अमा की रात 
 निराकाश में छेड़ दे प्रेम की बात ।


प्यार नहीं बंधा है रिश्तों की रेखाओं में 
नर्म कोहरा अहसास का व्याप्त रूहों में 
लांघ कर उम्र और काल की सीमाओं को 
चलो थाम लें प्यार के नए फंसानों को ।


छूटता अपनों का साथ ,जुड़ जाते बेगाने 
मन तू आज़ाद पंछी किधर उड़े क्या जाने 
आज इस मुंडेर पे नाच रहा  है भर थिरकियां
कल उसकी वीरानगी पे भर रहा था सिसकियाँ ।


हृदय की नीरवता में तुमने कलरव मचाई 
तिमिर का कर नाश ,सुबहा नई दिखाई 
अब न जाना छोड़ जग के चपल वार में 
डूबते का तिनका बन जाना मझधार में ।


हर संवेदना को शब्दों की डोर में बाँध
 आओ उतार दें हर सच्चाई निर्बाध
यकीनन जो बात होंठों तक नहीं आती है 
पन्नों पर आसानी से उतर जाती है  ।




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  पुरुष तुम बुनियाद हो 

अर्चिमान हो तुम अधिलोक का 
पौरुष और पराक्रम का मिसाल हो 
गौरव है सूर्य यों प्राची का 
तुम भी कुल का अभिमान हो I
आदिकाल से तुम जग में 
इतिहास शौर्य का रचते आये 
अतुल्य बल है तुम्हारी रग में 
धरोहर नित नयी गढ़ते आये I
पुरुष तुम बुनियाद सृष्टि के 
पर भागीदारी मेरी कमतर क्यों 
जीवन यात्रा बिन दो पहिये के
 भला सोच लिया कैसे क्यों I
अजातशत्रु अवश्य गरूर इतना पर 
कि बन बैठे हमारे भाग्य विधाता 
नारी की अहमियत दरकिनार कर 
बन गए हमारे पूर्ण निर्माता I
समय आ गया पहचानो सत्य को 
बिन स्त्री अस्तित्व है अधुरा 
चाँद बिन रात के सौन्दर्य को 
चकोर ने  भी है धिक्कारा I
तुम भावों के अपरिमित भण्डार हो 
पल में गरजते पल में बरसते
सुख - शांति का आधार हो 
 बाधाओं को काट लेते हँसते - हँसते I
विशय नहीं हमारे प्रियत्व पर 
दुःख की बदली हो या सुख की छाँव
टूट  जाये जब अहम् का भूधर
 झेल लेंगे हम काल का हर दाँव I

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         पगडंडी
द्रुमों की कतार को चीरते 
नदियों के तीरे होते 
एक पगडंडी निकलती है 
जो मेरे गाँव को जाती है ।
अनगिनत पैरों के निशान को 
वर्षों के इतिहास को 
बखूबी समेटती जाती है 
जो मेरे गाँव को जाती है ।
दूर तक फैली धान की बालियाँ 
मंजरों से लदी आम की डालियाँ
सुगंध इनकी हवा में समाती है
जो मेरे गाँव को जाती है।
चिड़ियों की चहचहाहट से
चूड़ियों की खनखनाहट से
एक मधुर स्वरलहरी जगती है
जो मेरे गाँव को जाती है ।
बैलों के गले की घंटियाँ बजतीं
पनघट पे जाने को सुंदरियां सजतीं
एक मदमस्त पवन बहती है
जो मेरे गाँव को जाती है ।
सावन में बूंदें बरसती हैं
झूलों की रस्सियाँ बंधती हैं
एक सौंधी खुशबू उड़ती है
जो मेरे गाँव को जाती है ।
बहुत प्यारा है मेरा गाँव
दिल ढूंढता वही बरगद की छाँव
पगडंडी वह बार - बार बुलाती है
जो मेरे गाँव को जाती है।

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आ गयी बदरिया

किरणों ने अवशोषण कर नीर समुद्र का
सजाया है श्वेत - श्याम श्रृंगार नभ का
 विरह अगन धधकाने आ गयी बदरिया
दूत बन जाओ मेघ बड़ी लम्बी है डगरिया

पिया बिसार कर सुध ले रहे सुख - छाँव
उड़ जाओ उस प्रदेश ,बैठे हैं वो जिस गाँव
स्मृतियों का डेरा है पलकों पे ,क्या करूँ सांवरिया
मन के घाव भरते नहीं कि कुहुक जाती है कोयलिया

बेध जाता है हिरदय को टेसू का अवहास
पपीहा जलाता दिल को ,नीरस लगे मधुमास
दिवस है ठहर गया ,आतप की वो दुपहरिया
जाने कब बह जाती है नैनों की कजरिया

धूप ने खूब चिढ़ाया शरद की ठिठुरन में
दीवारों का कर अवसंजन जलती विरहन में
आर्तनाद छलनी करता मन की दुअरिया
छा जाती है जब रात की खामोश चदरिया

चौखट पे नैनन ठौर साया जो दिख जाए तुम सा
कासे कहूँ दिल का हाल ,होश भी रहता गुम सा
यायावर पवन पहुंचा दे पैगाम उस नगरिया
उड़ रहा वक़्त लगा पंख ,गुजर रही उमरिया


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