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     तन्हा सफ़र चाँद का 

वक़्त है ,मौसम - ए - बहार का  
फिज़ाओं में रंग भरने का
 तन्हा - तन्हा जीवन में 
मुहब्बत ही मुहब्बत भरने का ।
अब तो ,धड़कनों पर राज़ का 
सपनों पर अधिकार किसी का 
मेंहदी रचे हथेलियों में 
शर्मा कर चेहरा छुपाने का ।
अमोल है ,जुड़ना दिल के स्पंदनों का 
बहकना शाम की रंगीनियों का 
दुनिया की स्नेहल भीड़ में 
अहसास अकेला होने का ।
रुत है ,दरिया -ए -इश्क में बहने का 
इश्क की आग में जलने का 
हाल -ए -दिल बयां करने में 
घबरा कर होंठों को काटने का ।
देखा है एक जोड़ा हंसों का 
कसमें लेते जीने - मरने का 
ठहर कर छत की मुंडेर पे 
पैगाम दे जाते ,मुझ सा उनके हाल का ।
बोझिल है ,तन्हा सफ़र चाँद का 
थका -थका ,तलाश हमसफ़र का 
टिक कर खिड़की के एक कोने पे 
प्रयास है मुझे  अपना बनाने का ।
अजीब है आलम बेचारगी का 
अंदाज़ जुदा है जीते - जी मरने का 
उस एक ने नूर भरा जीवन में 
जवाब नहीं मेरे दिलबर का ।

Ravi Beck  – (16 January 2013 at 15:47)  

अब वक्त है बधाई स्वीकार करने का
सुन्दर प्रस्तुति

पढ़ के अच्छा लगा

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