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आज नया गीत लिखूँ
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नैनों की भाषा का मौन प्रतीक लिखूँ
जी चाहता है आज नया गीत लिखूँ।
 मन आँगन में गूंजता कलरव  पाखी का
रोम - रोम में नया स्फुरण सा लगता है
यूँ तो मौसम है अभी  पतझड़ का
पर हर शाख में वसंत दिखता है।
प्रियतम तुम्हारे जादुई सम्मोहन का
रग - रग में छलकता प्रीत लिखूँ
जी चाहता है आज नया गीत लिखूँ।
साँसों में गूँथ लिया तुम्हारे नाम को
दिन सुवासित ,रात महका सा रहता है
सिंदूरी आभ में रंग लिया भाल को
तन दहका मन बहका सा लगता है।
 इक तुम्हारे नाम की  मेहंदी
हाथों में रच मनमीत लिखूँ
जी चाहता है आज नया गीत लिखूँ।
मरुथल की वीरानियाँ थीं बिखरी
तुमसे मिल जीवन सरस लगता है
भेदकर कोहरा घना, धूप है निखरी
समय का फेर अनुकूल लगता है।
आ जाओ तोड़  रस्मो रिवाज़
जीने  का नया रीत लिखूँ
जी चाहता है आज नया गीत लिखूँ।

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