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"साम्य"

                                              
कहते हैं जिसको बुलबुला पानी का ,
साम्य है इसमें दर्शन जीवन का ।
उठकर गिरना ,गिरकर मिट जाना ,
क्षणभंगुर है साँस ,विराम किसने जाना ।

नयनाभिराम है आज वसंत उपवन का ,
दूर नहीं है झलक कंकाल टहनियों का ।
खिलकर मुरझाना ,मुरझा कर सूख जाना ,
यही तो है जीवन -चक्र ,अंत किसने जाना ।

प्रतीक है सफ़र क्षितिज प़र के  सूरज का ,
घंटे भर का बहार ,फुलवारी खुशियों का ।
उगना चढ़ना ,चढ़ कर डूब जाना
क्षीण होती जीवन लालिमा ,अस्त किसने जाना ।

डॉ॰ मोनिका शर्मा  – (30 November 2011 at 16:37)  

नयनाभिराम है आज वसंत उपवन का ,
दूर नहीं है झलक कंकाल टहनियों का ।
खिलकर मुरझाना ,मुरझा कर सूख जाना ,
यही तो है जीवन -चक्र ,अंत किसने जाना ।

बहुत बढ़िया ...गहन अभिव्यक्ति

न जाने फिर भी जीवन के चक्रव्यूह को समझना इतना मुश्किल क्यों ...?

kavita vikas  – (2 December 2011 at 06:33)  

@monikaji,and anil jayaniji many many thanks

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण)  – (14 December 2011 at 20:29)  

जीवन का पाठ पढाती सी लगी आपकी यह कविता!

kavita vikas  – (15 December 2011 at 04:38)  

हमारे अनुभव मार्गदर्शी होते हैं ।

prakriti  – (27 March 2012 at 08:54)  

प्रतिबिम्ब जो परमात्मा का प्राणियों में कर सके,
फिर वह घृणा संसार में कैसे किसी से कर सके।
सर्वत्र दर्शन परम प्रभु का, फिर सहज संभाव्य है,
अथ स्नेह पथ से परम प्रभु,प्रति प्राणी में प्राप्तव्य है॥

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