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"आँखों में बसता है"



पलाश की तरुणाई,बौर का फूटना
पपीहे की पीहू,कोयल का कूजना,
आँखों में बसता है ।

दुबिया पर मोती ,हरसिंगार के श्वेत श्रृंगार ,
आँगन में उतरती धूप,कुहासे से झाँकती भोर
आँखों  में बसता है ।
बरसाती नदियों का यौवन ,कानन का मोर
अल्हड़ मेघ का गर्जन ,झकझोरता चितचोर
आँखों में बसता है ।

जीवन के आखिरी पड़ाव पर,विस्मृत होती यादें
जब-जब दस्तक देता मधुमास
पुलक उठता मनमयूर , संजीवनी बनती वादें
थम भी जाए समय का प्रवाह ,तो क्या परवाह
कालचक्र तो
आँखों में बसता है ।

prakriti  – (27 March 2012 at 07:58)  

रचना मेरा काम नही हैं , कवि या लेखक नाम नही हैं .
हाँ , जब तुम मुझको पढ़ते हो , एक काम कर पाती हूँ ,
भावो के दर्पण मे तुमको , मैं तुमसे ही मिलवाती हूँ ।।
कितनी इछाओ की नदिया ,कितने अरमानों के सागर ।
बूंदों सी छोटी सी खुशिया ,और कुछ पीड़ाओं के गागर ।
हां ,जब तुम मुझको पढ़ते हो ,एक काम कर पाती हूँ ,
तेरी पीड़ा के भावों को ,मैं उर अपना दे जाती हूँ ।
शर्त यही हैं मेरे शब्दों को , आकर पढ़ जाने की ।
जो होती है एक वीर के ,बस सूली चढ़ जाने की ॥
जब जब आना , संग तुम्हारे , हर भावो के सागर लाना ,
स्वप्न अधूरे , तीव्र कामनाओं से पूरित गागर लाना ,
और देखना दृष्टा होकर मैं ,कैसे और कब आती हूँ ।
शब्द तुम्हारे,हाथ तुम्हारे ,पर कविता,मैं जन्माती हूँ ॥

amresh mishra  – (4 August 2012 at 14:38)  

mere bhavo ki peeda...wah...shabd ka sanyojan jabrdst

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