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              विश्वास 
मधुर से इस शब्द की टंकार
रूह से रूह को जोड़ती है 
रिश्तों के फलने का है यह आधार 
वरना जीवन नासूर बन जाती है ।
वर्षों तक साथ रहना 
महज एक औपचारिकता है 
गर न हो विश्वास का सेतु 
तो ज़ख्मों का रिसाव स्वाभाविक है। 
विश्वास की बुनियाद जब हिल जाती है 
रिश्तों की गाँठ तब न खुल पाती है 
विवाह होता है सात जन्मों का बंधन 
तभी जब विश्वास की चासनी में घुले हों 
नहीं तो एक जन्म ही 
सात जन्मों का भार बन जाता है ।
विश्वास है जीवन की धुरी 
जहां न पनपता वहाँ 
रहती है रिश्तों में दूरी 
विश्वास से प्रेम है 
प्रेम से भाव है 
भाव से जीवन की  कविता है ।
विश्वास के खाद से ही 
कब्र पर खिली - खिली घास है 
जिसके कोमल अहसास से 
बिछोह के दमघोंटू क्षण पाते साँस हैं ।
वरना अविश्वास के कंटक तो 
केवल छलते और खुद को छलाते  हैं ।

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                  वर्तमान 
वर्तमान का अस्तित्व बिंदु 
दोनों तरफ योजक चिह्नके साथ 
बीचो -बीच रहा है ।
एक तरफ अतीत को जोड़ता 
दूसरी तरफ भविष्य को टटोलता 
वह खड़ा होता है चौराहे पर 
दाएं -बाएं ,आगे - पीछे 
सब ओर बाँहें फैलाए 
अतीत की स्मृतियाँ और 
भविष्य के सपनों को जोड़ने वाला 
एकमात्र सूत्र वर्तमान ही है ।
वो सपने जो हैं समाज का आधार 
अतीत से लेकर हथियार 
गढ़ते जाते हैं वर्तमान की धार 
वर्तमान संवेद सपनों को भी गढ़ता है 
अतीत की सीढ़ी पर चढ़ 
भविष्य को बुनता है ।
वर्तमान के पास विशेषाधिकार है 
कल की विध्वंशता पर सृजन कर 
आशा के फूल खिलाता है ।
और सृजनात्मकता पर संतोष की बयार 
बहाकर कर्मठ बनाता है ।
भविष्य वर्तमान बनने की 
जद्दोजहद में बार - बार इससे जुड़ता है 
पर विडंबना तो देखो 
जिस दिन भविष्य इससे मिलता है 
वर्तमान अतीत बन जाता है ।
शायद इस बात की प्रभुता के लिए 
कि कोई किसी का साथ नहीं देता है 
हरेक काल की मानिंद मानव भी 
अकेला आया है ,अकेला जायेगा ।


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