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तुम सावन मैं बदली 

सावन जब - जब तुमने चाहा
मैं बदली बन जाती हूँ 
निःशब्द मौन निमंत्रण में तुम्हारे 
आत्म - विसर्जन कर जाती हूँ ।

बारिश की मोतियाँ चुन कर 
जीवन अपना सरस बना लेते  हो 
मन की सुखी डालों पर पुष्पित कर 
मुझे निःशेष बना देते हो ।

मास दर मास कैसे बीते बताओ ज़रा 
विरह अगन में छोड़ दिया जलने को 
अगले बरस तक तपा कर धरा 
पुनः बदली बन बरसने को ।

एक जुस्तजू है सावन पिय की 
भूल न जाना मुझे लम्बी दूरियों में 
बेमौसम देखो जब एक टुकड़ी बादल की
 समझ लेना रात बीती है अँखियों में ।

sangita  – (22 August 2012 at 09:36)  

प्रकृति से मानवीय रिश्तों के मनोहारी भाव

Virendra Kumar Sharma  – (22 August 2012 at 09:56)  


एक जुस्तजू है सावन पिय की
भूल न जाना मुझे लम्बी दूरियों में
बेमौसम देखो जब एक टुकड़ी बादल की
समझ लेना रात बीती है अँखियों में ।बहुत सुन्दर पंक्तियाँ ,इन्हीं के नाम दो पंक्तियाँ कवि नीरज की -शायद मेरे गीत किसी ने गायें हैं ,इसीलिए बे -मौसम बादल छाये हैं . .कृपया यहाँ भी पधारें -
ram ram bhai
बुधवार, 22 अगस्त 2012
रीढ़ वाला आदमी कहलाइए बिना रीढ़ का नेशनल रोबोट नहीं .

Virendra Kumar Sharma  – (22 August 2012 at 09:56)  


एक जुस्तजू है सावन पिय की
भूल न जाना मुझे लम्बी दूरियों में
बेमौसम देखो जब एक टुकड़ी बादल की
समझ लेना रात बीती है अँखियों में ।बहुत सुन्दर पंक्तियाँ ,इन्हीं के नाम दो पंक्तियाँ कवि नीरज की -शायद मेरे गीत किसी ने गायें हैं ,इसीलिए बे -मौसम बादल छाये हैं . .कृपया यहाँ भी पधारें -
ram ram bhai
बुधवार, 22 अगस्त 2012
रीढ़ वाला आदमी कहलाइए बिना रीढ़ का नेशनल रोबोट नहीं .

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण)  – (23 August 2012 at 04:17)  

वाह क्या कहने..
बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

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