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लक्ष्य

         

             लक्ष्य

रवि को स्वयं की आग में
जल - जल कर ठंडक तलाशते
मैंने देखा है ।
जलधि को अपनी ही गहराई में
डूबते - उतराते तट तलाशते
मैंने देखा है ।
अम्बर को अपने ही विस्तार में
झुल-झुल कर सतह तलाशते
मैंने देखा है ।
भावनाओं के समंदर से उबरते
विचारों के मंथन से निकलते
मैंने जान लिया है -
मानव मात्र निमित्त है।
स्व की खोज में निहित विधि है 
अपने अस्तित्व  की पहचान लक्ष्य है 

यही सबसे बड़ी निधि है ।

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’  – (12 February 2012 at 05:49)  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति
आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 13-02-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

आनन्द विश्वास  – (12 February 2012 at 18:06)  

आत्म-चिन्तन की सहज मन
की गहराई तक पहुँचने वाली
अभिव्यति।
धन्यवाद।
आनन्द विश्वास

ana  – (12 February 2012 at 19:34)  

gahan chinta wishayak kavita.....ati uttam

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu"  – (13 February 2012 at 01:18)  

gahan chintan se otprot shandaar rachna

कविता विकास  – (13 February 2012 at 03:53)  

आप सभी के प्रशंसा भरे शब्दों से नए निर्माण को बल मिलता है । मैं आपकी शुक्रगुज़ार हूँ ।

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