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आज का प्यार
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आज का प्यार
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कहने को तो प्यार
अब भी किये जाते हैं ,
पर नहीं आतीं अब गुलाबी शामें
नहीं आती रुत , मर - मिटने की अरमां थामे
इंतज़ार में पलकें बिछाए ,आँखों में खुमारी
लम्बे - लम्बे खतों में लिखी दिल की  बेकरारी
कहाँ मिलते जोड़े ,ज़माने की तोड़ पहरे
हाल - बेहाल और हवाइयाँ उड़ते चेहरे
नैनों की भाषा में होती थी बातें
बिखरे ज़ुल्फ़ों में बयांती बेचैन रातें
खट्टे - मीठे मुलाकातों का सिलसिला
अधरों में कंपकपांती ,इच्छाओं का जलजला
सब कुछ बदल गया
जब से मानव मशीन हो गया।
न चाहत रही न दिल में कशिश
समर्पण आकर्षण की दूर हुई ख़्वाहिश
कितनी अजीब बात है !
समय के घंटों में कोई बदलाव नहीं
मौसमों के आवागमन में कोई कटाव नहीं
फिर क्यूँ सर्द सा अहसास हुआ
सब कुछ उथला - उथला , क्षणिक हुआ
प्यार में बेहद थे सब  इरादे
 अब हद में भी प्यार न हुआ।

Sumit Tomar  – (18 February 2015 at 23:56)  

काफी शब्दों से सहमत हु आपके!
आभार

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