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आतंक



                              आतंक     


रात की निस्तब्धता 
अदृश्य शोर 
धुंधलाती भोर 
निर्लिप्त क्षुब्धता।
हर ओर एक विकल प्राण 
दौड़ती -भागती ,कुछ तलाशती 
कभी पाती ,कभी खोती
अखंडित मृगतृष्णा ।
चेतन शून्य सहमे प्रयास 
अनदेखा मंजिल 
कितनी दूर ,कितने पास 
परेशां बेहाल 
खोते आस ।
एक विराम की अभिलाषा 
कितनी सबल ,कितनी  सुखद 
यही तो है अविरल जीवन की 
     चिरंतन परिभाषा ।

sangita  – (25 January 2012 at 09:01)  

चिरंतन परिभाषा ।sarthak post hae samarthak ban gai hoon aap bhi bane to mujhe khushi hogi.

कविता विकास  – (26 January 2012 at 03:32)  

thank you Sangitaji ,aap ki samarthak ho gayee hun

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