इस ब्लॉग से मेरी अनुमति के बिना

कोई भी रचना कहीं पर भी प्रकाशित न करें।

समर्थक

माटी की देह

तरु के वृंत पर खिलता सुमन
देख  आज जग की खुशहाली  
इतरा रहा भाग्य पे अपने भुवन
क्या पता कल आये न आये हरियाली
क्षणिक हैं दिन बहार के
क्रूर  हाथों से   कल कोई माली
गूँथ कर तुम्हे हार प्रणय के
छीन  ले सौन्दर्य का लाली
रूप लावण्य का मत दंभ भर
देख लालायित मधुप को
मदहोश सा  अंग - अंग चूमता
आतुर तुम्हारे रसपान को
मुट्ठी का रेत सा है जीना
जान  यह मन होता विचलित
हरि - शीश पर जाने कब चढ़ जाना
यही अनिश्चित है निश्चित
पछताएगा रिश्तों से कर नेह
चार दिन का है हँसना - गाना
फिर तो माटी की देह
है माटी में मिल जाना ।

संगीता स्वरुप ( गीत )  – (6 September 2013 at 11:14)  

यथार्थ को कहती सुंदर रचना

अरुन शर्मा अनन्त  – (7 September 2013 at 04:26)  

नमस्कार आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (08-09-2013) के चर्चा मंच -1362 पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

Reena Maurya  – (7 September 2013 at 21:31)  

बेहतरीन रचना...
:-)

poonam  – (8 September 2013 at 06:52)  

बहुत सुंदर सार्थक भाव

Post a Comment

LinkWithin