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मैं समझ जाती


रंज ओ गम में कोई टूट रहा
कोई ख़्वाबों में ही मगरूर रहा
ख्वाहिश दिल की बस इतनी थी
क्या उसकी हालत भी मेरे जैसी थी !!!
वह मचलता मेघ ,मैं मयूर बन गयी
प्यार में उसके मैं धरती बन गयी
इंतज़ार में जिसके ज़र्रा - ज़र्रा  बंज़र है
वह छत बदल - बदल  कर बरसता है।
इतना ही तो चाहा  था ज़िन्दगी से
कभी वह भी याद करता संजीदगी से
अनायास कभी हिचकियाँ बंध जातीं
कोई याद कर रहा है ,मैं समझ जाती।

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