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     प्रकृति सन्देश 
    
पत्तों पर गिरती बूँदों की थाप 
एक मधुर संभास 
नीर है सुख का या है संताप 
होता नहीं ज़रा आभास ।
विरह अगन की पीर में 
झुलस गए पात - शाख 
शुष्क वायु के मौन निमंत्रण में 
उड़ उठा नीरद लगा पाख ।
संजोया था महीनों से उर में 
आज जी भर  बरसता है 
आखिर कितना रोके कोई दिल में 
कभी तो सैलाब टूटता है ।
प्रबल सम्मोहन है पयोद का 
धरती बड़ी प्रसारिणी है 
देख बरसना पिय का 
झट घूँघट हरा काढ़ी है ।
क्षणिक है बहारों की चारुता 
मौसम की अंगड़ाई इच्छित है 
विलग काल की करुण असमग्रता
मिलन - आह्लाद में अस्तमित है ।
अंतर्मन के तार जब जुड़ते हैं 
चाहत स्पंदन बन जाती है 
शब्द औ' भाषा लुप्त हो जाते हैं 
मूक प्रेम मिसाल बन जाती है ।

expression  – (4 June 2012 at 03:54)  

सुंदर संदेश.....

प्यारी रचना.

डॉ.सुनीता  – (4 June 2012 at 04:01)  

कोमल भावों की अद्भुत प्रस्तुति...

डॉ. जेन्नी शबनम  – (6 June 2012 at 12:06)  

बहुत ही सुन्दर अर्थपूर्ण रचना, बधाई.

Udan Tashtari  – (9 June 2012 at 08:01)  

अंतर्मन के तार जब जुड़ते हैं
चाहत स्पंदन बन जाती है
शब्द औ' भाषा लुप्त हो जाते हैं
मूक प्रेम मिसाल बन जाती है ।

-बेहतरीन!!

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