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मेरा अस्तित्व 

आँधियों के वेग से अब डर नहीं लगता 
आवेश का हर क्षण इसका प्रतिरूप होता ।
कुछ ने बर्बाद किया ,कुछ से जोड़ा नाता 
अमिट आघात उपहार बन मिल जाता


पात हूँ डाल से जुदा, पर हवाओं ने हार मानी
उड़ा न पाया साथ अपने, मेरी प्रगल्भता पहचानी ।
बुला रहा हर शाख ,जब न उड़ने न सूखने की ठानी 
मुझसे बनता नीड़ है, मेरी अस्मिता सबने पहचानी ।

आज बेरौनक सी लगती ,कल उत्साह जगाती
जज़्बातों के अनगिनत रंगों में तू नहाती ।
ऐ जिंदगी ,पल - पल का लेखा - जोखा तू सजाती 
जाने किस रूप में कौन मिल जाए ,खूब बहलाती ।

दुःख की बदली नहीं मैं ,धरती सा अस्तित्व मेरा 
नाप सका न कोई सीमाएँ मेरी ,ऐसा व्यक्तित्व मेरा ।
मेरी ख़ामोशी में तूफां है ,उर में बहती प्रेम धारा
आग में तपकर कुंदन बनी ,आँखों में ब्रह्माण्ड सारा ।

रविकर फैजाबादी  – (11 May 2012 at 05:55)  

खुबसूरत प्रस्तुति |
आभार ||

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण)  – (11 May 2012 at 17:46)  

बहुत बढ़िया प्रस्तुति!
आपकी प्रविष्टी की चर्चा आज शनिवार के चर्चा मंच पर लगाई गई है!

कविता विकास  – (12 May 2012 at 05:18)  

thank you Ravikarji and shastriji ,abhar

ana  – (12 May 2012 at 10:18)  

bahut sundar prastuti

Jeevan Mag  – (14 May 2012 at 20:27)  

behtarin prastuti shabdon ka napa tula prayog

Shanti Garg  – (15 May 2012 at 01:31)  

बहुत बेहतरीन व प्रभावपूर्ण रचना....
मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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