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   ख्वाहिशें 


कभी घिर जाऊँ जीवन के झंझावात में 
तुम चुपके से राह दिखा देना 
बंदिशें लगी हैं पग -पग में 
मिलने की तरकीब बता देना ।
आँगन के सुनसान कोने में 
अपनी रोशनी बिखरा देना 
खो जाऊँ गर दुनिया की भीड़ में 
धुँधली यादों में पहचान लेना ।
ख्वाहिशों की अनगिनत परतों में 
झाँक सको तो झाँक लेना 
जो बातें बयां न हो लफ़्ज़ों में 
झुकती पलकों से जान लेना। 
बगावत की ठान ली मन में 
बलिष्ठ बाँहों का सहारा दे देना 
साथी,उल्फत के निःशब्द तरानों में 
अहसास के फूल बटोर लेना ।
चाँद की रात हो रूमानी फिज़ां में 
तुम सेहरा बाँध आ जाना 
देख लेना गर दरवाज़े की ओट में 
चंद फूलों की महक बिखेर देना  ।

सतीश सक्सेना  – (9 May 2012 at 22:32)  

अच्छा प्रयास है
शुभकामनायें आपको !

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