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"तमन्ना" (कविता विकास)

उनसे मिलने की तमन्ना थी बड़ी शिद्दत से
सामना  होते  ही हम अनजान हो गए
जिस पल को जीना चाहा बड़ी मुद्दत से
आगाज़ पाते ही वो खामोश हो गए ।
अरमानों की आग को छू कर देखो
बिन चिंगारी ही सुलगने को बेताब हैं
अहसास के नर्म थपेड़ों ज़रा सब्र रखो
हवा के झोंके रुख़ बदलने को तैयार हैं ।
 हम रेत में आशियाँ बनाने वाले हैं 
लहरों की परवाह खाक करते हैं 
फ़िक्र बस है कि सागर मेरे पास है 
दो बूंद की फिर भी प्यास है ।
अपनी खुदगर्ज़ी एक ताक पर रख
चलो उड़ जाते हैं लगा कर पंख
भौरें को पता है , लौ से टकराने की परिणति
तिल -तिल जलने का गम नहीं ,यही मेरी नियति ।

नारद  – (3 December 2011 at 03:41)  

आपकी ये रचना कल चर्चा मंच पे लगायी जा रही है ,

आभार ,
सादर

कमल

kavita vikas  – (13 December 2011 at 09:04)  

thank you ,very grateful to you.

amresh mishra  – (16 May 2012 at 01:57)  

ye kavita purane dino ki yad kara gae kavita ji jis pal ko jeena chaha badi muddat se aagaj pate hi wo khamosh ho gae

amresh mishra  – (4 August 2012 at 14:35)  

sara samndar mere pas hai ek bund pani meri pyas hai

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