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     बरगद 


यह कहानी है ,बरगद के साम्राज्य का 
एक कानन का वह शहंशाह था ।
अहं था अपनों पर भगवान कहलाने का 
लटकी जटाओं में बच्चों का डेरा था ।
कोलाहल आस   -पास ,मस्ती घंटों का 
चबूतरे पर पंचायत का जमावड़ा था ।
प्रतिद्वंद्वी नहीं कोई दूसरा उस परिवेश का 
सूखी झाड़ियों और दूब पर रौब था ।
पनपा नहीं  गवाह तत्कालिक इतिहास का
 बियाबान के राजा ने  तब जाना बाँटने में सुख है।
मोटे तने की बुजुर्गियत सुनती है पीड़ा एकाकी का 
 ष्णता नस - नस की यूँ ही सूख जाती है 
पुनर्जन्म हो तो, चाह है छोटा बनने का
दंश अकेले का बरगद बन झेल लिया है ।
विशाल हो गया रस निचोड़ कर कण -कण का
एकाधिकार नहीं चाहिए ,छोटा  होने में भलाई है ।

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