>> Sunday, 11 December 2011 –
बरगद –आत्मकथ्य
बरगद
यह कहानी है ,बरगद के साम्राज्य का
एक कानन का वह शहंशाह था ।
अहं था अपनों पर भगवान कहलाने का
लटकी जटाओं में बच्चों का डेरा था ।
कोलाहल आस -पास ,मस्ती घंटों का
चबूतरे पर पंचायत का जमावड़ा था ।
प्रतिद्वंद्वी नहीं कोई दूसरा उस परिवेश का
सूखी झाड़ियों और दूब पर रौब था ।
पनपा नहीं गवाह तत्कालिक इतिहास का
बियाबान के राजा ने तब जाना बाँटने में सुख है।
मोटे तने की बुजुर्गियत सुनती है पीड़ा एकाकी का
उष्णता नस - नस की यूँ ही सूख जाती है ।
पुनर्जन्म हो तो, चाह है छोटा बनने का
दंश अकेले का बरगद बन झेल लिया है ।
विशाल हो गया रस निचोड़ कर कण -कण का
एकाधिकार नहीं चाहिए ,छोटा होने में भलाई है ।