" .......उड़ने की इच्छा हुई" (कविता विकास)
>> Monday, 5 December 2011 –
उड़ने की इच्छा
आशाओं के पंख लगा कर
क्षितिज पर उगते सूरज की
लालिमा में डूबने की इच्छा हुई
आज फिर उड़ने की इच्छा हुई ।
आज फिर उड़ने की इच्छा हुई ।
वाष्प में परिणत होकर
नभ में तैरते पयोद की
कालिमा में घुसने की इच्छा हुई
आज फिर उड़ने की इच्छा हुई ।
आज फिर उड़ने की इच्छा हुई ।
फूलों के सुर्ख रंग चुराकर
फुनगी पर लगे कोपलों की
सम्वृद्धि में खोने की इच्छा हुई
आज फिर उड़ने की इच्छा हुई ।
आज फिर उड़ने की इच्छा हुई ।
चंद लम्हे व्यस्त घंटों से निकालकर
कुछ उनकी पीड़ा ,कुछ खुशियों की
परिधि में विचरने की इच्छा हुई ।
आज फिर उड़ने की इच्छा हुई ।
जाल जगत पर आपका स्वागत है।
आपने बहुत सुन्दर रचना लिखी है।
निरन्तर लिखती रहिए!
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i will follow what you said. thank you.