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शरद तुम आ गए






   लो ,काँस के फूल फिर खिल गए 
दिवास्पति ने समेट लिया है ताप 
धीरे - धीरे ,शरद तुम आ गए 
दिवस संकुचन में दिखती  छाप ।

सुखद स्नेहल  धूप पर 
तन गयी कोहरे की चादर 
लम्बी काली गहराती रात पर 
ठिठुरन की सौगात कर गयी कातर ।

महलों की पीड़ा तो क्षणभंगुर होती
झोपड़ी पर तुम कहर ढाते ।
दुःख  की बदली  बेध सुख की  किरणें आतीं 
परिवर्तन - चक्र यही सन्देश लाते 

प्रकृति ने तुम्हारा आमंत्रण स्वीकारा
हरीतिमा इर्द - गिर्द लहराने लगी।
कल प्रिय थे ,आज इंतज़ार तुम्हारा
फूलों की डोलियों से सेज सजने  लगी  ।

Atul Shrivastava  – (31 December 2011 at 00:15)  

सुंदर रचना।
गहरे भाव......

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक  – (3 August 2013 at 10:07)  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा मंगलवार (06-08-2013) के "हकीकत से सामना" (मंगवारीय चर्चा-अंकः1329) पर भी होगी!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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