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"माँ" (कविता विकास)

अतीत के आईने में निहारने को
जब स्वयं को सँवारती हूँ
कई झिलमिलाते परतों में माँ
तुम ही तुम नज़र आती हो ।

पूजा की थाल सजाकर नमन को
जब देव -प्रांगण जाती हूँ
अनेक देवताओं के बीच माँ
तुम देवी बन मुस्काती हो ।

दुनिया की भीड़ में अपने -आप को
जब असहाय ,अकेला पाती हूँ
भागते क़दमों से आकर माँ
तुम मुझे थाम लेती हो ।

उम्र के ढलते पड़ाव पर अवलोकन को
जब विस्मृत होती पन्ने पलटती हूँ
एक विस्तृत मकड़जाल की उलझन से माँ
तुम मुझे खींच निकालती हो ।

ज़मीनी फासलों के दरम्यान तुम्हारी दीदार को
जब तड़पती, आहें भरती हूँ
कभी दुर्गा ,कभी लक्ष्मी रूप में माँ
तुम मेरी शक्ति बन जाती हो ।

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