"माँ" (कविता विकास)
>> Friday, 16 December 2011 –
माँ
अतीत के आईने में निहारने को
जब स्वयं को सँवारती हूँ
कई झिलमिलाते परतों में माँ
तुम ही तुम नज़र आती हो ।
पूजा की थाल सजाकर नमन को
जब देव -प्रांगण जाती हूँ
अनेक देवताओं के बीच माँ
तुम देवी बन मुस्काती हो ।
दुनिया की भीड़ में अपने -आप को
जब असहाय ,अकेला पाती हूँ
भागते क़दमों से आकर माँ
तुम मुझे थाम लेती हो ।
उम्र के ढलते पड़ाव पर अवलोकन को
जब विस्मृत होती पन्ने पलटती हूँ
एक विस्तृत मकड़जाल की उलझन से माँ
तुम मुझे खींच निकालती हो ।
ज़मीनी फासलों के दरम्यान तुम्हारी दीदार को
जब तड़पती, आहें भरती हूँ
कभी दुर्गा ,कभी लक्ष्मी रूप में माँ
तुम मेरी शक्ति बन जाती हो ।
बहुत सुन्दर ....www.shabbirkumar.co.cc