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"तमन्ना" (कविता विकास)

उनसे मिलने की तमन्ना थी बड़ी शिद्दत से
सामना  होते  ही हम अनजान हो गए
जिस पल को जीना चाहा बड़ी मुद्दत से
आगाज़ पाते ही वो खामोश हो गए ।
अरमानों की आग को छू कर देखो
बिन चिंगारी ही सुलगने को बेताब हैं
अहसास के नर्म थपेड़ों ज़रा सब्र रखो
हवा के झोंके रुख़ बदलने को तैयार हैं ।
 हम रेत में आशियाँ बनाने वाले हैं 
लहरों की परवाह खाक करते हैं 
फ़िक्र बस है कि सागर मेरे पास है 
दो बूंद की फिर भी प्यास है ।
अपनी खुदगर्ज़ी एक ताक पर रख
चलो उड़ जाते हैं लगा कर पंख
भौरें को पता है , लौ से टकराने की परिणति
तिल -तिल जलने का गम नहीं ,यही मेरी नियति ।

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"कुछ रातें कटती नहीं"

तृष्णाओं की यात्रा अनंत होती हैं ,
चाहे मन में लगाम लगा लो
कुछ इरादे दबते नहीं ।

आशाओं की पारदर्शिता छलावा होती हैं ,
चाहे लाख जतन कर लो
कुछ फासले थमते नहीं ।



विचारों की दुनिया विस्तृत होती है ,
चाहे शब्दों के रंग जितनी चढ़वा लो 
कुछ कैनवास भरते नहीं ।

सन्नाटों की प्रतिध्वनियाँ बुलंद होती हैं ,
चाहे कितनी भी दीवारें चुनवा लो
कुछ यादें बिसरती नहीं ।

बाट जोहते सुबह -शाम होती हैं ,
चाहे आँखों में साल बसा लो
कुछ रातें कटती नहीं ।



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"साम्य"

                                              
कहते हैं जिसको बुलबुला पानी का ,
साम्य है इसमें दर्शन जीवन का ।
उठकर गिरना ,गिरकर मिट जाना ,
क्षणभंगुर है साँस ,विराम किसने जाना ।

नयनाभिराम है आज वसंत उपवन का ,
दूर नहीं है झलक कंकाल टहनियों का ।
खिलकर मुरझाना ,मुरझा कर सूख जाना ,
यही तो है जीवन -चक्र ,अंत किसने जाना ।

प्रतीक है सफ़र क्षितिज प़र के  सूरज का ,
घंटे भर का बहार ,फुलवारी खुशियों का ।
उगना चढ़ना ,चढ़ कर डूब जाना
क्षीण होती जीवन लालिमा ,अस्त किसने जाना ।

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बेटी

   

शबनम की मोती पर
सुनहरे लाली सी
       चंचल

कुहासे के धुएं में
छटती भोर सी
      शीतल

मोगरे की खुशबू में
भंवरों की डोली सी
      कोमल


पर्वतों के ढलान पर 

 हिम की चादर सी 
      निर्मल 


पूनम की रात में 
दुधिया चाँदनी सी 
     धवल 


समस्त सुन्दर रचना में 
 कलाकार की कल्पना सी 
तुम व्याप्त हो 


इहलोक की बुनियाद में 
एक इष्टिका सी 
मज़बूत आधार हो 




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"आँखों में बसता है"



पलाश की तरुणाई,बौर का फूटना
पपीहे की पीहू,कोयल का कूजना,
आँखों में बसता है ।

दुबिया पर मोती ,हरसिंगार के श्वेत श्रृंगार ,
आँगन में उतरती धूप,कुहासे से झाँकती भोर
आँखों  में बसता है ।
बरसाती नदियों का यौवन ,कानन का मोर
अल्हड़ मेघ का गर्जन ,झकझोरता चितचोर
आँखों में बसता है ।

जीवन के आखिरी पड़ाव पर,विस्मृत होती यादें
जब-जब दस्तक देता मधुमास
पुलक उठता मनमयूर , संजीवनी बनती वादें
थम भी जाए समय का प्रवाह ,तो क्या परवाह
कालचक्र तो
आँखों में बसता है ।

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" बदलाव "

   
दरख्तों  के  साए  में  अब सुकून नहीं होती
परिंदों  की उड़ान में ,अब संगीत नहीं होती
गाँवों की पगडंडियाँ सड़कों में तब्दील हो गयी
चबूतरों की पंचायत गुज़रे ज़माने की बात हो गई।

बदलाव की बयार ऐसी मंज़र लाई
कि आबाद नगरी अब बंज़र हो गयी
अँधेरे खौफ़ का सबब बन गए
खेत-खलिहान श्मशान का पर्याय बन गए।

शहरों की गलियों में अब शोर  नहीं होता
मित्रों की संगत में वो आराम नहीं होता
अब तो हर शख्स ऐसा व्यस्त हो गया
कि बाँया अंग दाँए के लिए अनजान हो गया

साँसों के तारातम्य  में गति अवरुद्ध हो गई
पलकों का झपकना कहाँ अब तो आँखें  खुली रह गईं
जीवन पथ व्यापार औ' जीवन -साथी सौदागर हो गया
रगों में बहता लाल रंग स्याह सफ़ेद हो गया ।

                                                                                                                                KAVITA  VIKAS

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lakshya

                                                                                 लक्ष्य                                                  
रवि  को स्वयं की आग में
जल -जल कर ठंडक तलाशते
मैंने देखा है ।
जलधि को अपनी ही गहराई में
डूबते -उतराते तट तलाशते
मैंने देखा है ।


अम्बर को अपने ही विस्तार में
झूल -झूल कर सतह तलाशते
मैंने देखा है ।

भावनाओं के भंवर से उबरते
विचारों के मंथन से निकलते
मैंने जान लिया है
मानव मात्र निमित्त है

स्व की खोज में निहित विधि है
अपने अस्तित्व की पहचान लक्ष्य है
यही सबसे बड़ी निधि है।
           
                 कविता विकास

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