"तमन्ना" (कविता विकास)
>> Thursday, 1 December 2011 –
तमन्ना
उनसे मिलने की तमन्ना थी बड़ी शिद्दत से
सामना होते ही हम अनजान हो गए
जिस पल को जीना चाहा बड़ी मुद्दत से
आगाज़ पाते ही वो खामोश हो गए ।
अरमानों की आग को छू कर देखो
बिन चिंगारी ही सुलगने को बेताब हैं
अहसास के नर्म थपेड़ों ज़रा सब्र रखो
हवा के झोंके रुख़ बदलने को तैयार हैं ।
हम रेत में आशियाँ बनाने वाले हैं
लहरों की परवाह खाक करते हैं
फ़िक्र बस है कि सागर मेरे पास है
दो बूंद की फिर भी प्यास है ।
हम रेत में आशियाँ बनाने वाले हैं
लहरों की परवाह खाक करते हैं
फ़िक्र बस है कि सागर मेरे पास है
दो बूंद की फिर भी प्यास है ।
अपनी खुदगर्ज़ी एक ताक पर रख
चलो उड़ जाते हैं लगा कर पंख
भौरें को पता है , लौ से टकराने की परिणति
तिल -तिल जलने का गम नहीं ,यही मेरी नियति ।