इस ब्लॉग से मेरी अनुमति के बिना

कोई भी रचना कहीं पर भी प्रकाशित न करें।

कोरोना को दूर भगाना है
-----------------------------

ख़ुशियों का संसार बसाना है
कोरोना को दूर भगाना है ।
    आयी है सर पर विपदा भारी
    दहशत में है यह दुनिया सारी
    काल बना सर पर मँडराता है
    यह जीवाणु बहुत धमकाता है
अपने ही आज पराए दिखते
दूरी में ही हम जीना सीखते
संयम से ही काम चलाना है
कोरोना को दूर भगाना है।
      घर पर रहने का अवसर आया
      अपनेपन का रिश्ता समझाया
      बाहर – भीतर मत करना कुछ दिन
      गप्पों – क़िस्सों में रम जा कुछ दिन
देह नहीं कोई यह पाएगा
चेन नहीं इसका बन पाएगा
मानव को यह जंग जिताना है
कोरोना को दूर भगाना है।
       बच्चे – बूढ़े इक हो जाएँगे
       अनुशासन की बात बताएँगे
       फिर न महामारी आने पाए
       ऐसी ग़लती क्यूँकर दुहराए
चिंता में मत करना प्राण विकल
चेतोगे आज तभी होगा कल
जनजीवन ख़ुशहाल बनाना है
कोरोना को दूर भगाना है।
   

Read more...

चलने को तो चल रही है ज़िंदगी
बेसबब सी टल रही है ज़िंदगी ।

बुझ गये उम्मीद के दीपक सभी
तीरगी में ही पल रही है ज़िंदगी ।

ऐ खुदा ,रहमो इनायत पे तेरी
ये मुकम्मल फल रही है ज़िंदगी ।

हमसफ़र आ थाम ले दामन मेरा
बिन तेरे अब खल रही है ज़िंदगी ।

जो लहक तूने लगायी प्यार की
देख उसमें जल रही है ज़िंदगी ।

जैसे कोई बर्फ़ का सिल्ली हो ये
अब हरिक पल गल रही है ज़िंदगी ।

वैसे तो चार दिन की है मगर
आजकल में टल रही है ज़िंदगी ।

काश ,आए मेरे गुलशन में फिज़ा
चाह में ही ढल रही है ज़िंदगी । 

Read more...

आदमखोर
---------------------------------
उन दिनों जब नील नदी के किनारे
मिस्र की सभ्यता उजड़ रही थी
भूख से बिलबिलाता मनुष्य
बीहड़ वन से गुजरते हुए 
मनुष्य का ही शिकार कर
अपनी क्षुद्धा की तृप्ति करता था।
आदमखोर अब भी हैं
उनकी बस नीयत बदल गयी है
खाने को पर्याप्त चीज़ें हैं अब
इसलिए वे मात्र उन माँसल
अंगों में दांत गड़ा कर
और पंजों से नोच
क्षत - विक्षत छोड़ देते हैं क्योंकि
वे आदमखोर नहीं हैं। 

Read more...

बसंत
---------------------------------

नव कालिका ,नव पल्लव
नवजीवन का आह्वान
कानन कुंजन में कलरव
गूँजे नवल विहान ।
सरसों फूली,  झूली अमुआ 
टेसू अमलतास लहराए
महमह मदमाती महुआ
दावानल सा भरमाए ।
जड़ – चेतन में तरुणाई
प्रकृति संग आई
देख साँझ की अरुणाई
पवन चली बौराई ।
रंग बसंती , रूप बसंती
झूमकर आया वसंत
मन गिरह खोल सुमति
भर गया ऋतु महंत ।
समाहित कर अक्षय उल्लास
चलीं  नदियां ताल सरवर
बसंत की आभा औ विभास
धरा पर गगन पर  मनहर ।

------------------------------------------------------------------

Read more...

बड़ी करिश्माई है अहसासे मुहब्बत
जीवन नहीं कभी बंज़र होता है।

संग मौसम उतर जाओ फ़िज़ाओं में
तुमसे ही शादाब मेरा शज़र होता है।

रात कट जाती है आँखों में अक्सर
उधर भी क्या यही मंज़र होता है।

अजाबे इश्क़ भी अज़ीज़ होता है ,पास
जब तुम्हारी बांहों का पिंजर होता है।

दिल की बात आती नहीं जुबां पे
दिल पे चलता तब खंज़र होता है। 

Read more...

हँसना सीखा दिया रोना सीखा दिया
प्यार ने तेरे ख्वाबों में जीना सीखा दिया।
बाद मुद्दत के ऐसा कोई शख्स मिला
पत्थर को पिघलना सीखा दिया।
गमो खुशी में तलाशते हैं वही कांधा जिसने
करवटों में शब बीताना सीखा दिया।
दिलाज़ार की गुस्ताखी कैसे भूले कोई
आग में जो बेखौफ़ कूदना सीखा दिया।
कोरी थी जीवन की किताब यह
प्यार ने उसके रंग भरना सीखा दिया।

Read more...

बना दो या बिगाड़ दो आशियाँ दिल का
हाथ में ये तेरे है ,नहीं काम कुदरत का।

तोड़ दो यह ख़ामोशी ,खफ़गी भी अब
सर ले लिया अपने, इल्ज़ाम मुहब्बत का।

जी करता है बिखर जाऊं खुशबू बन
तोड़ कर बंदिशें तेरी यादों के गिरफ्त का।

बज़्मे जहान में कोई और नहीं  जंचता
कुर्बत में तेरे जवाब है हर तोहमत का।

उम्मीदों का दीया जलता है मुसलसल
कभी तो बरसेगा मेघ उसकी रहमत का।...copyright k.v.  

Read more...

बरस - बरस घन बरसाओ  रे
------------------------------------------------

बरस - बरस घन बरसाओ  रे
हरस - हरस मन हरसाओ रे।
 शप्त पतझड़ में मधुवन
 आँखन में  है असवन
 सूना - सूना है चितवन
 नद- पोखर ,वन - उपवन
उठ रहा मेघों का ज्वार  आज
नयन और गगन हुए  एक आज
यादों से न तन को तरसाओ रे
बरस - बरस घन बरसाओ रे
 कैसे बतलाऊँ प्रेम की पीर
 निशि दिन रहता मन अधीर
  पलक बिछाऊँ यमुना के तीर
   इस सावन आएगा मेरा हीर
 हर वन - प्रांतर का उत्ताप आज
हर मन - आँगन का संताप आज
सरस पावस धन दरसाओ रे
बरस - बरस घन बरसाओ रे
 ओढ़ कर चुनरिया धानी
  इठला रही वसुधा रानी
   न करना मेघ मनमानी
 तुमसे बड़ा न कोई दानी
बरसा अमृत कण - कण सरसाओ रे
बरस - बरस घन बरसाओ रे। 

Read more...

सडकों में नपती हैं शहरों की दूरियां 
दिल के रिश्तों में कहाँ कमती दूरियां 

अहसासों को  बाँध लेते गर सीमाओं में 
फिर कहाँ सालती हमारे  बीच की दूरियां 

टूट जाता है सब्र का सैलाब कभी- कभी 
बारिशों  में जब जिय जलाती हैं दूरियां 

पहले तो पंछी भी पहुंचाते थे सन्देश
अब कहाँ रहे पंछी कि तय करें दूरियां

सीने में आग लेकर भी जी रहे मुकम्मल
इस  आग को और हवा देती हैं दूरियां...copyright kv

Read more...

अनचाहा मिल जाता है


---------------------------------
याद तुम्हारी जब आती है
हृदय सुमन खिल जाता है
जिसकी चाह नहीं मिलता वह
अनचाहा मिल जाता है ।
               हो नज़रों से दूर भले तुम
               मन में पर रहते तुम हो
               दुख – सुख के हर मंज़र पर भी
               आँखों से झरते तुम हो ।  
साथ के मौन संवादों से
उधड़ा मन सिल जाता है ।
                कोई शिकवा नहीं किसी से
                न इल्तिज़ा अरी ज़िंदगी
                हमनें तो हँसते – रोते की
                तेरी उम्र भर बंदगी ।
रुत वसंत के आते ही यह
मन अक्सर हिल जाता है ।
                   खुश हूँ जब से ठानी है
                   खुश रहना हर हालत में
                   सज़दे करती हूँ मंदिर में
                   रम कर छंदों – आयत में ।
द्वार प्रभु के ही टिकता पाँव
जब काँटों से छिल जाता है ।
                     क़ैद आज भी है आँखों में
                     मुलाकातों का वो गाँव
                     तेरी बाँहों के घेरे में
                     मिलती सुकूं की जो छांव ।
बड़े जतन से संभालूँ जब
पास तेरे दिल जाता है ।
जिसकी चाह नहीं मिलता वह
अनचाहा मिल जाता है ।

Read more...

संक्रमण
-------------
युग का सबसे संक्रमणकारी दौर है यह 
हवा में तैरते वायरस कितनी जल्दी 
बातों के रोग का संक्रमण फैला देते हैं 
इसका अंदाजा भी नहीं लगता। 
बेबात पर बात बढ़ जाती है 
चुप रहने पर बवाल  हो  जाता  है
 यही  तो संक्रमण है 
खड़ा होता है वह  अकेला कवि 
चारों ओर से घिरा हुआ 
शक्तिशाली ,तलवारधारी ,बाहुबलियों से 
और ,अभिमन्यु तो निहत्था है 
लड़ रहा है अपने शब्दों के बल पर
आँखों  में रोश ,हृदय में आग  लिए
जूझ रहा है मूल्यों की धरातल पर । 
एक तरफ हथियार है 
एक तरफ अकेला कलमकार 
मूक दर्शक बन देखने वाले मानुष 
जिजीविषा की लालसा रखते हो 
तो कूद पड़ो अभिमन्यु के साथ 
 जीतेजी भी तो तुम मरते आये हो 
युगों से ,क्योंकि तुम शब्दहीन हो 
पर वह मसिजीवी जीवित रहेगा 
बिना संक्रमण का शिकार हुए। 

Read more...

उसूलों की लड़ाई
--------------------------
परिवेश का प्रभाव
आधुनिक सोच के तीखे तेवर
सब कुछ हावी हो जाता है
पुरातनपंथी कहलाने वाले
तथाकथित माता - पिता पर
वयस्क होते बच्चों के अपने पैमाने
अपनी जटिल लीक पर चलते हुए
हमारे निर्दिष्ट उसूलों पर
अक्सर आघात करते हैं
तब हमें अपनी ही कार्यशैली
चिढ़ाती हुई सी प्रतीत होती है।
 जिसे हम पीढ़ियों का अंतर कहते हैं
वह बड़ी सहजता  से
हमारे पैदाइशी मौलिकता को
निगल लेते हैं
और हम किंकर्तव्यविमूढ़ सा
अपने ताने - बाने में विचरते
मौन हो जाते है।
हमारा मौन होना हमारी स्वीकृति नहीं
आत्मसमर्पण भी  नहीं ,बस
आत्ममंथन है
लेने - देने की प्रक्रिया पर।

Read more...

अलकनंदा तुम बहती जाना 
--------------------------------------
अपने बृहद बाहुओं में 
भरकर जग का पीर 
अलमस्त ,अल्हड ,उच्श्रृंखल 
कलकल निनाद ,धीर - अधीर 
अलकनंदा तुम बहती जाना। 

प्रखर ऊर्जा ,वेग निर्बाध 
जन्मों का गिरहकट,तुम तारणहार 
एक डोर आस की ,बँधी साँस की  
अंतर्तम से है वंदन लिए पुष्पहार
 अलकनंदा तुम बहती जाना। 

तुम ज़िन्दगी की तपिश में 
बहा देती शीतल धार 
मत्परायण कर्म तुमको अर्पण 
शून्यप्राय प्राणी का कर उद्धार 
अलकनंदा तुम बहती जाना। 

छा रहा देखो गहन अंध 
टूट रहा है मर्यादा का तार 
तुम सत्य हो नश्वरत्व में 
फिर क्यों न सुन्दरतम जीवन सार 
 अलकनंदा तुम बहती जाना। 

तुम विजित ,हम ही पराजित 
रूप- पर्याय में गुण तुम नारी 
तुम सिद्ध हो ,हम भ्रमित 
अपनी अनुकम्पा का अल्पांश कर वारी 
अलकनंदा तुम बहती जाना।

Read more...

आज नया गीत लिखूँ
-------------------------------

नैनों की भाषा का मौन प्रतीक लिखूँ
जी चाहता है आज नया गीत लिखूँ।
 मन आँगन में गूंजता कलरव  पाखी का
रोम - रोम में नया स्फुरण सा लगता है
यूँ तो मौसम है अभी  पतझड़ का
पर हर शाख में वसंत दिखता है।
प्रियतम तुम्हारे जादुई सम्मोहन का
रग - रग में छलकता प्रीत लिखूँ
जी चाहता है आज नया गीत लिखूँ।
साँसों में गूँथ लिया तुम्हारे नाम को
दिन सुवासित ,रात महका सा रहता है
सिंदूरी आभ में रंग लिया भाल को
तन दहका मन बहका सा लगता है।
 इक तुम्हारे नाम की  मेहंदी
हाथों में रच मनमीत लिखूँ
जी चाहता है आज नया गीत लिखूँ।
मरुथल की वीरानियाँ थीं बिखरी
तुमसे मिल जीवन सरस लगता है
भेदकर कोहरा घना, धूप है निखरी
समय का फेर अनुकूल लगता है।
आ जाओ तोड़  रस्मो रिवाज़
जीने  का नया रीत लिखूँ
जी चाहता है आज नया गीत लिखूँ।

Read more...

आज का प्यार
------------------------
आज का प्यार
------------------------
कहने को तो प्यार
अब भी किये जाते हैं ,
पर नहीं आतीं अब गुलाबी शामें
नहीं आती रुत , मर - मिटने की अरमां थामे
इंतज़ार में पलकें बिछाए ,आँखों में खुमारी
लम्बे - लम्बे खतों में लिखी दिल की  बेकरारी
कहाँ मिलते जोड़े ,ज़माने की तोड़ पहरे
हाल - बेहाल और हवाइयाँ उड़ते चेहरे
नैनों की भाषा में होती थी बातें
बिखरे ज़ुल्फ़ों में बयांती बेचैन रातें
खट्टे - मीठे मुलाकातों का सिलसिला
अधरों में कंपकपांती ,इच्छाओं का जलजला
सब कुछ बदल गया
जब से मानव मशीन हो गया।
न चाहत रही न दिल में कशिश
समर्पण आकर्षण की दूर हुई ख़्वाहिश
कितनी अजीब बात है !
समय के घंटों में कोई बदलाव नहीं
मौसमों के आवागमन में कोई कटाव नहीं
फिर क्यूँ सर्द सा अहसास हुआ
सब कुछ उथला - उथला , क्षणिक हुआ
प्यार में बेहद थे सब  इरादे
 अब हद में भी प्यार न हुआ।

Read more...


भावभीनी बात हो
-------------------------

दंभ -अहंता से दूर
सहज यथार्थ हो अपनी परिभाषा
रीत न जाए मधुरस जीवन का
ऐसे आकर्षण का प्रतिपल
उठता विशब्द ज्वार हो।

मान - अपमान से परे
एक घरौंदे के राजा - रानी हम
पथ प्रस्तर हो या शूलों भरी
प्यार - मनुहार का अविरत
कलकल  निर्मल धार हो।

द्वंद्व - प्रतिद्वंद्व को भूल
नैनों के दर्पण में हो प्रतिबिंबित
दो आत्माओं की प्रणय अभिलाषा
जल - सा पारदर्शी अंतस से
भावभीनी बात का उद्गार हो।

दुराव - छिपाव को छोड़
सुन्दर सी जीवन बगिया में
विश्वास सलिला निर्बाध बहे
कुछ अर्पण ,कुछ समर्पण का
वितत जीवन सार हो।

Read more...

मैं और  तुम
---------------------
शहर  के शोर  - गुल से दूर
स्याह अँधेरे में
जब दुनिया होती है
नींद के आगोश में    
तब मिलते हैं
मैं और तुम।
कोई बंदिशें नहीं ,शिकवा नहीं
बावफा हम नहीं ,बेवफा भी नहीं
तज़ुर्बों से सीखा है
हर चाहत पूरी नहीं होती वरन्
क्या चाँद फलक पे होता ?
बगावत करके अपनों से
कोई  एक  ही  तो मिलता
चाहे तुम ,चाहे  वे
या कोई भी नहीं
पर हमने निभायी है दुनियादारी
देखो ,कितना महफूज़ रखा है तुम्हें
अपने ख्यालों - ख्वाबों में
बिन रोक - टोक  के ,अनवरत
जब तक साँसें चलेंगी
मिलते रहेंगे
मैं और  तुम।  

Read more...

मन समंदर हो चला
----------------------------
भर कर पीड़ जग  का  सारा 
मन समंदर हो चला 
उच्श्रृंखल विकल लहरें 
भावावेश में उठती गिरती
तोड़ कर सीमाओं का पाश 
तट पर थक पसरती 
बूंद - बूंद आलिंगन कर के भी 
मन घट रीत चला। 
बनते नहीं मेघ अब 
नैनों के आकाश में 
बेमौसम संतृप्त हुआ 
किसी के इंतज़ार में 
विस्तृत वीरानगी को तकते 
मन बंज़र हो चला। 
पनपते नहीं अरमां नए 
बीत गए वो तितली दिन 
जीवन रंग धूमिल हुआ 
बोझल मन तुम बिन 
जज़्ब कर अंतर के उन्माद 
मन रेतीला हो चला। 

Read more...

 फासले क्यूँ हैं...


गुज़र जाते हो हवा की मानिंद पल भर में 
ख्वाब बन  कभी तो रात में ठहर जाओ 

पास होकर भी फासले क्यूँ हैं दरम्यां में 
अपनी ही आग में मत यूँ जल जाओ 

खुद से भी दूर हो जाती तन्हाई के आलम में 
हौले से आकर कभी ज़ेहन में समा जाओ 

जीने की आरज़ू है तुम्हारे पहलु में
 हर मौसम में  खुद को ढाल उतर जाओ 

मुद्दतों से बर्फ जमा है दरीचों में 
आंच से अपनी कभी तो पिघला जाओ 

न चाहा फ़िज़ां और न सुहानी सांझ ही 
ख़िज़ां की खामोशी में ही पसर  जाओ 

लहरों की तरह हम उठते - गिरते रहे 
साहिल बन कभी तो गले लगा जाओ 

Read more...

नया साल  - नया संकल्प
-------------------------
भरेंगे खुशियों के रंग
---------------
पृथ्वी का सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाना  यानि समय के चक्र का घूमना। इस अनवरत चलने वाली प्रक्रिया को हमने महीनों और वर्षों में बाँट दिया। आवश्यक भी था ताकि प्रकृति और मौसम की अदाओं को उनकी  अवधि से जाना जा सके। काल खण्डों का ज़खीरा एक निश्चित अवधि में नए साल का तोहफा हमें दे जाता है। बारिश अपनी सिसकती बूंदों के साथ ज्यों ही विदा हुआ शीत ने पांव फैलाना आरम्भ कर दिया। फिर लम्बी उबाऊ रात ,मानों जाते - जाते भी जाने का मन हो। रात की स्याही का एक कतरा  भोर की बेहद नाज़ुक सफेदी के साथ मिलकर अजीब सम्मोहन पैदा करता है। यही है वह संधिकाल जब मेरे सामने के विशाल अमलतास और अशोक की डालियों में ऋत्विज सा प्रभाती  गान  करता खगदल उड़ने को व्याकुल हो जाता है। भोर होने का   आभास अलौकिक है। मैं पिछले बीस सालों से उगते सूरज का गवाह बन उसकी अक्षुण्ण ऊर्ज़ा को महसूस कर रही  हूँ। साथ होते हैं कुछेक सुबह - सुबह टहलने वाले लोग ,वरना ज्यादातर  लोग उस समय निद्रा देवी की गोद में ही होते हैं।  जिस दिन आलस करती हूँ ,सारा   दिन बोझिल   होता  है। दिसंबर आते - आते कुहरे की चादर इतनी देर तक तनी होती है कि सूर्यदेव का दर्शन सम्भव नहीं होता। फिर भी क्या दिनचर्या रूकती है ?नहीं ,भले ही काम कुछ देर से शुरू हो ,पर होता ही है। तो फिर क्यों इस  नए साल के उमंग में कुछ ऐसा संकल्प लें जो नीरसता में भी सरसता का अनुभव करा दे। ऐसा तभी सम्भव है जब हम जीवन से प्यार करना सीख जायेंगे। सभी इंद्रियों का सचेतन अवस्था में होना मानव जीवन की एक बड़ी उपलब्धि है। आइए,इस उपलब्धि का हर्ष मनाएँ।जीवन के अनुराग और विराग को पूर्णतः भोगें। इस नितांत सत्य से हम  मुँह नहीं मोड़ सकते कि किसी प्यारे की मौत या बीमारी से जूझता कोई अज़ीज़ हमें तोड़ देता है। पर इस स्थूल शरीर से मोह करना भी तो एक भ्रम है। जितनी जल्दी इस भ्रम को समझ जायेंगे , निराशा हम पर हावी नहीं होगी। समय एक मरहम का काम करता है जो ज़ख्म की पीड़ा भुलाकर खुशियों की सीपियाँ बिखेर देता है। उन सीपियों को झोली में भरने का  संकल्प लें।
 नया साल  - नया संकल्प। बच्चे एकेडेमिक परफोरमेंस सुधारने का संकल्प लेते हैं तो गृहिणियाँ वजन कम कर के नीरोग रहने का। कोई समय से ऑफिस पहुँचने का संकल्प लेता है तो कोई अपनी कार्य - प्रणाली सुधारने का। संकल्प - विकल्प और तार्किक क्षमता में प्रकृति का सबसे सबल प्राणी मनुष्य है। बीते वर्ष का विश्लेषण करना वह जानता है। क्या खोया ,क्या पाया ?क्या अधूरा रह गया ?क्या सोचा था और क्या   हो गया ?आदि। संकल्प लेना  एक चेतनशील प्राणी का लक्षण है और उसका क्रियान्वयन करना सजग होने का प्रमाण। कुछ लोग संकल्प तो बड़े - बड़े लेते हैं पर उनका पालन करने में पिछड़  जाते हैं। इसलिए संकल्प भी अपने सामर्थ्य और साधन के अनुसार लेना चाहिए जिसे पूरा करना हमारे वश में हो अन्यथा  हताशा हाथ लगती है। फिर जीवन की खुशियाँ पराई हो जातीं हैं।   गौरतलब है कि उद्यमी ही लक्ष्य तक पहुँच पाते हैं और जब लगे कि हमने अपनी मंज़िल पा ली है तो अपने आप को शाबाशी दें ,जश्न मनाएं। खुश होने की किसी  भी स्थिति में समझौता नहीं करनी चाहिए।
घर की सुख - शांति बनाये रखने  का और नौकरी के  उच्चतम  शिखर तक पहुँचने का  संकल्प तो आपने हरेक साल लिया है। चलिए, उनसे इतर इस बार  कुछ ऐसा संकल्प लें जिसमे प्रकृति और पर्यावरण का हित हो तथा परोपकार की  भावना निहित हो। अपने घर की आया के बच्चे को एक घंटा  निःशुल्क  पढ़ा दें ,अनपढ़ को अक्षर ज्ञान दें ,प्रतिफल लौट कर अवश्य आएगा। अपने बंगले के वीरान कोने में अपने हाथों से पौधारोपण करें। जब वृक्ष बन कर वह फूलेगा - फलेगा ,यकीं मानिये बिलकुल वैसी ही प्रसन्नता होगी जैसी अपने बच्चों को बढ़ते देख कर होती है। अपने जीवन काल में पेड़ लगाने का संकल्प बहुत नेक है। इससे पर्यावरण की रक्षा होगी और आने वाली पीढ़ियों को एक हरे - भरे  ग्रह का सौगात मिलेगा। पतझड़ में भी आपको सुंदरता दिखाई देगी क्योंकि तब तक आप जान चुके होंगे कि कंकाल सा प्रतीत होता तरु भले ही कुछ समय के लिए निराश कर दे पर यह तो जीवन - चक्र है। पतझड़ में यदि लता पल्लवन  हो तो क्या वसंत मोहक लगेगा? आखिर जिस रोशनदान से रश्मि आती है ,उसी के पीछे तो रजनी भी गहराती है।तो ,खुश रहने का संकल्प लें। हर दिन एक उत्सव की भाँति हो। याद करें ,जब भैतिकवादी सुख - सुविधाओं का जुनून नहीं पनपा था तब घर में एक फ्रिज़ या टेलीविज़न आने पर भी मोहल्ले वाले उसे देखने आते थे। कितने अच्छे थे वो दिन। छोटी - छोटी खुशियाँ जीवन में रंग भरतीं थीं आज हम बड़ी खुशियों का इंतज़ार करते हैं जो मृगतृष्णा के अलावा और कुछ नहीं। बड़ी खुशियों के इंतज़ार में जीवन की शाम हो जाती है फिर इनका उपभोग करने के अवसर क्षीण पड़ जाते हैं। कुछ बिंदुओं पर ध्यान दें तो बहुत हद तक जीवन में खुश रहने के मूलमंत्र हम पा सकते हैं -
. जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाएँ। अपने मन में नकारात्मक विचार आने दें। जैसे ही ईर्ष्या ,द्वेष या बदला लेने की भावना आने लगती है , अपने साँसों की आवाजाही पर ध्यान केंद्रित करते हुए तेज क़दमों से चलें।
. हर आदमी का एक वज़ूद होता है भले ही वह पद - प्रतिष्ठा में आपसे छोटा हो। उनका मज़ाक हरगिज़ उड़ाएँ।
. ख़राब से ख़राब चीज़ों में भी अच्छाई ढूंढे।
. ईश्वरीय सत्ता पर भले ही विश्वास हो ,फिर भी जीवन की अनिश्चितता को सदा याद रखें।
. संवेदनशील बनें तभी आप फूलों की सुंदरता  ,पंछियों का कलरव ,ओस के बूँदों की शीतलता और बच्चों की तुतली बोली का आनंद उठा  पाएंगे।
. प्रण कर लें कि दिल में किसी प्रकार के  कलुषित विचार को नहीं पनपने देंगे और स्वस्थ दिमाग से कुछ अच्छा सीखने की राह पर चलेंगे ,तो कोई बाधा राह से डिगा नहीं पायेगी।
एक दिन मैंने आठ - नौ साल के एक बच्चे से कहा ,"पिछले साल वाली  गलतियाँ नए साल में नहीं दुहराना ,प्रण करो। " बच्चे ने मासूमियत से कहा ,"जी मैम  , इस बार नयी गलतियाँ करूँगा। " बच्चे ने एक  शाश्वत सच को याद दिला दिया ,"टू ऐर इज़ ह्यूमन। " गलतियाँ करना तो स्वाभाविक है पर बार- बार एक ही गलती हो इसे हमे ज़रूर देखना चाहिए क्योंकि इसका सीधा सम्बन्ध हमारे स्वभाव और जीवन - शैली से जुड़ा है जो हमे विषाद की स्थिति में ला सकता है।
याद कीजिये ,अंतिम बार कब आपने  बालकनी से ढलते सूरज का नज़ारा आँखों में क़ैद किया था ?कब बिटिया का निकर बदलते समय उसके पैरों को गाल से टिकाकर  रोमांचित हुए थेगली में खेलते बच्चों की  फ़ौज़ ने आपके आँगन में आयी  गेंद  माँगा और आपने प्यार से झिड़कते हुए एक बॉलर की  तरह उनकी ओर गेंद फेंका ,कब ? आपके ललाट पर  गिरती हुए ज़ुल्फ़ों को देख कॉलेज के  दिनों में कसा हुआ एक जुमला क्या अब याद आता है ? नहीं न। दौड़ -भाग  और  तनाव  भरी  ज़िन्दगी में हँसने के लिए वक़्त नहीं। तो , इस साल  पत्नी के साथ उन स्थानों को जाएँ जहाँ  आप हनीमून के लिए गए थे। तब और अब के परिवर्तन आपको गुदगुदाएंगे। अपने सच्चे मित्रों के साथ कुछ वक़्त गुज़ारें जो एक - दूजे के हमराज़ थे और बीती बातों को याद कर खूब ठहाके लगाएँ। बच्चों को लेकर लांग राइड पर जाएँ और हर वह काम करें जिसको करने में आपने खूब आनंद उठाया था ,मसलन बारिश में नहाना ,गुलेल मार कर टिकोले तोड़ना ,ठेले पर के गोलगप्पे खाना आदि एक बार ठान लें तो खुश रहने के अनेक रास्ते खुद खुद निकल आयेंगे।

संकल्पों का बाज़ार गर्म है। आइये ,हम भी नए साल में एक ऐसा रिज़ोल्युशन लें जो अब तक नहीं लिया यानि जीवन की अवस्था चाहे जैसी भी हो हम खुश रहने का प्रयत्न करेंगे। जीवन को एक उत्सव मान कर एक - एक पल को जीयेंगे।खुशियों   का सैलाब अपनी चपेट में हमारे दुखों  को बहा ले जाए और हम नित नयी उर्ज़ा से भरे रहें।

Read more...

LinkWithin